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उत्तराखंड में पंचायती चुनाव का शंखनाद आरंभ
September 19, 2019 •      विजय सिंह बिष्ट।

उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायती राज का शंखनाद आरंभ हो गया है। प्रत्याशियों का प्रचार लोकलुभावन व्याख्यानों विज्ञापनों के साथ साथ डोर टु डोर अपने और अपने सहयोगियों से चरम सीमा पर है।  जनपद पौड़ी गढ़वाल के थाना क्षेत्र सतपुली में  चार सौ पेटी शराब की पकड़ी गई हैं  यह पता नहीं लगा कि यह शराब कहां परोसी जानी थी, और इस का उपभोक्ता कौन है। ये तो सारी मिली भगत का स्वरूप है।
 यह भी समाचार है कि मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से जो प्रत्याशी हैं ही छोटे बाजारों में निवासित उम्मीदवार हैं। राजनीति के पंडित वोट के लिए उन्हें वोटर लिस्ट में शामिल कर लेते हैं। इस आधार पर उनका अधिकार बनता ही है उत्तराखंडी जब पलायन कर रहा है और ये लोग धंधे के रूप में उत्तराखंड में निवासित हैं साथ ही समाज से धुल मिल रहे हैं जिन लोगों ने इन्हें बसाया सारी गलती उनकी है।

स्वत्रंता के पश्चात ग्राम पंचायतों में केवल मात्र  जन्म मृत्यु का विवरण मात्र , किसानों को प्रशिक्षण दिलना तथा अधिक से अधिक सैकड़ों में देय धन पर विकास का कार्य पानी रास्तों का सुधारीकरण था।जो बर्तमान में करोड़ों और लाखों रूपयों में करवा जाता है। तब भारत के प्रधानमंत्री को पांच हजार और राष्ट्रपति को मात्र दस हजार मासिक वेतन मिलता था।
 ग्राम सभाओं का उदय काल१९७०ई०के बाद हुआ। इसको लाभ का पद माने जाना लगा।जहां पहले अधिकांश संभ्रांत व्यक्ति निर्विरोध चुने जाते थे,अब एक ही ग्राम पंचायत में प्रत्याशियों की संख्या इस पद के लिए चुनाव लड़ने लगी है।

जो जीत जाते हैं वे अपने चुनाव खर्च को पहले वसूलने का जुगाड लगाने लगते हैं। उनके सामान्य घर सुविधा संपन्न हो जाते हैं। उनको पूछने वाला भी कोई नहीं होता है। कई मामलों में शासन द्वारा नियंत्रण भी होता चला आ रहा है।
  बर्तमान चुनाव प्रणाली स्वागत योग्य है।उसको कार्य रूप में परिणित करना,हर स्तर पर सुशासनीय व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता है । भ्रष्टाचार चाहे जड़ से पनपे या उच्चस्तरीय हो विकास में अवरोधक ही है.

जब बंगाली शरणार्थियों का आरक्षण के लिए सांसद महोदय संसद में आवाज उठा सकते हैं। तो यहां का दलगत समाज जो राजपूत, ब्राह्मण, जातिगत में बंटा है मौन ही रहने की जोर शोर विरोध करेगा ही।
 राजनीति के प्रवेश द्वार से जिस तरह शुद्ध राजनीति का आरंभ किया गया है स्वागत योग्य है जिस प्रकार केंद्र और राज्य सरकारें शैक्षिक योग्यता ,मात्र दो संन्तानोंको प्राथमिकता दें रहा है त्रिस्तरीय पंचायत से विधायक और सांसदों को भी इस दायरे में शामिल करे। राष्ट्र उत्थान में महत्वपूर्ण होगा।
१_प्रत्याशी की बर्तमान और सेवा मुक्ति अवधि की आय का पूर्ण विवरण रखा जाय।
२_प्रत्याशी की आय पर इनकम टैक्स का नियंत्रण हो।
३_जन प्रतिनिधि जो दैनिक भत्ता एवं वेतन लेते हैं, पेंशन के अधिकारी नहीं होने चाहिए।
४_समाचार देखा सुना कि उत्तर प्रदेश के विधायक और सांसद गरीब हैं उनसे इनकम टैक्स न लिया जाय , उन्नीस मुख्यमंत्री भी

इस लिस्ट में हैं उपासजनक और हास्यास्पद है एक चतुर्थ कर्मचारी टैक्स देता है रिटर्न भरता है। निवास , यात्रा , मेडिकल  सारी सुविधाओं के बाद टैक्स न देना,लाखों में वेतन लेकर गरीब बनना उपहास ही कहा जाएगा। अफसोस तब होता है कि प्रधानमंत्री वी०पी०सिंह जी के जमाने आज तक इसका राजनेता लाभ लेते रहे हैं।

देश की महापंचायत में बैठे कानून निर्माताओं को हिये तराजू में तोल कर  "सबका विकास सबका विश्वास "पर निर्णय लेना ही चाहिए। आशा है देश की धरातलीय त्रिस्तरीय पंचायतों में सुयोग्य,निश्छल, और ईमानदार प्रतिनिधि  प्रतिभाग करके आयेंगे। ।। राष्ट्र का निर्माण सुयोग्य व्यक्तियों के हाथ।।