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सोशल मीडिया अब शोषण मीडिया बन चुका है
September 9, 2019 • डॉ अरविंद आनन्द

एक जमाना था जब चिठ्ठी-पत्री और टेलीग्राम के माध्यम से अपनी बातो को एक दुसरे के पास पहुँचाया करते थे,अच्छा खासा समय भी लगा करता था,और संदेश प्राप्ति पर उन्हे जो खुशी मिलती थी वो अकल्पनीय होती थी,लिखित शब्दो की अपनी गरिमा होती थी और उनका महत्व ऐसा हुआ करता था जैसे मानिए उन्हे अलादीन का चिराग मिल गया हो। ।
                          इसी बीच इन्सान वक्त के अनुसार बदलते परिवेश के अन्तर्गत दूरभाष,टेलीफोन,पेजर से गुजरते हुए मोबाईल तक पहुँच कर दूरियो को तो मानो अपने गिरफ्त मे ही कर लिया,और अपनी अभिब्यक्तीयो
को तो पंख ही लगा दिया हो और उसे नियमितता की दायरे मे बांध दिया हो,और अपना कद बढ़ाते हुये स्मार्ट फ़ोन वाले युग मे कब पहुँचा दिया,पता ही नही चला।
                  अद्भूत व अद्वितीय वैचारिक क्रांती के तहत आज फोर जी मोबाईल हम सबो के बीच ऐसी पैठ बना चुकी है,जैसे मानिए इसके बिना हमारी जिन्दगी ही अधुरी हो,और सोशल मिडिया के दौर मे सिमित्तता का दायरा तो खत्म ही हो गया,कोई भी अपनी बात कही भी और कैसे भी रख कर पूरी दुनिया मे फैला सक्ता है और किन्ही महानुभाव की बसुधैव कुटुंबकम वाली विचारधारा सफल होती नजर आ रही है।
                                          सोशल मिडिया की सकारात्मकता को नाकारात्मक तथ्यो को कब ग्रहण लग गयी हमे पता भी नही चली,,लोग अपनी बिकृत मानसिकताओ से उत्पन विचारधाराओ को ऐसे परोसने लगे जैसे  मानो उन्हे समाजिकता व सांसकृतिक सह सार्वजनिक जैसे सुसन्स्कारिक शब्दो से दुर दुर तक नाता नही हो,किसी को कुछ भी बोलना हो,परेशान करना होता है,सोशल मिडिया का सहारा लेकर भडास उतार लेता है।।लिहाज शब्द की तो मानो दुर्दांत हत्या हो चुकी हो।
                        कोई किसी देश के झंडे को अपमान करने वाले  फोटो-विडियो डाल देता है तो कोई धार्मिक चीजो को अनादर करते तथ्यो को रख देता है,तो कोई किसी लहूलुहान मृत शरीर की तस्वीर डालकर ज्यादा से ज्यादा शेयर करने की अपील करता है,और किसी अश्लील,भडकाऊ तथा अभद्र तस्वीर या वीडियो पर लाखो लाईक और कमेंट नजर आते है और वही दुसरी ओर अच्छी बातो वाली पोस्ट की कोई किमत ही नही होती है,,बेचारा की तरह अपनी बारी की इन्तजार करती रह्ती है।सोशल मिडिया पर ऐसे ना जाने कितने नकरात्मक तथ्य है जिसको हम देख कर अनसुना कर देते है उसका हमे भी पता नही होता।
                     ऐसे तो सोशल मिडिया की चर्चा पर सकारत्मक और तथ्यो पर विस्तार से चर्चा कर पाना सम्भव नही है लेकिन वास्तविकता के आधार पर इन्सान को इन्सान से जोड़ने वाले मिडिया को ना ही तोड़ने का साधन न बनाईये और ना ही बनाने दिजीये।इसे वरदान की श्रेणी मे रखकर सौभाग्य शाली बनिये ना की इसके सकारात्मकता का शोषण करके दुर्भाग्य की दुर्भावना का शिकार बनिये।।