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हर घर की यही कहानी
September 23, 2019 • विजय सिंह बिष्ट

किसको सुनाएं अपनी दारुण कथा। आज जो भी मिलता है अपनी कथा अपनों के ही दिये जाने वाले  दुःख दर्द की कहानी वयां करता है। हर घर की कहानी लगभग एक ही सीरियल की तरह है।सास सासुओं के झुरमुट में बहुओं की सारी कहानी शादी के बाद से नाती होने तक की प्रत्येक सीन की तरह सुनाती है। कभी सिर पर मारती है कभी छाती पीटती है। बहू ने मेरे बेटे पर जादू कर डाला है  हम से बोलता तक नहीं, आंखों से गंगा-जमुना बहाना तो बुढ़िया का हर दिन का काम है।नमक मिर्च मिलाने वाले तथा इधर की उधर करने वालों की कमी नहीं है।

मतलब सिद्ध करने के लिए बहू के साथ भी ठीक और सासु के साथ भी आंखें मटका कर बात  कर लेती है साथ ही मेरा नाम मत लेना तेरी बहू ऐसा कह रही थी राम राम जमाना बहुत बुरा है । मेरे बहू बेटे अभी मेरे हाथ में हैं मैं जैसा कहती हूं मजाल क्या जो टाल जायं।  यह इसलिए ताकि ये महारानी हमारे घर का भेद न ले सके। वहां की राम कहानी तो और भी भयंकर है।
 कुछ खुले मन की होती हैं और कुछ दूसरे का भेद ले लेती हैं अपना नहीं बताती।

अधिकतर इन्ही बातों से परिवार बिगड़ते जा रहे। दूसरों पर विश्वास आम बात हो गई है। अपनों पर नहीं।
जहां बुजुर्ग पति-पत्नी हैं वहां उनकी आपस में नहीं बनती। एक दूसरे पर दोष देना उनका जैसे धर्म हो गया है।पति पत्नी से कहते हैं तुमने सबको बिगाड़ दिया तुम हर समय बड़ बड़ाया करती हो। जो जैसा है करने दे।बहू भी तो बेटी है क्यों सब उन पर नहीं छोड़ देती।

अब तो प्रलय आने वाला है हां हां तुम्हारे माता-पिता ने भी मुझे ऐसे समझा था।वह तो मैं थी जो मैं सहती रही, तुम भी अपने मां-बाप ही साथ देते थे।

मुझसे तो ममता दीदी ही ठीक है बेचारी का पति नहीं है पर मज्जे से खा रही है बेटे बहू भी अलग रहते हैं। किसी का झंझट नहीं। किंतु बुढ़िया को ये पता नहीं ममता दीदी अपनों की ममता के लिए कितना तरसती है।स्व०पति के अभाव में उसे कितना बुरा लगता है कभी कभार जलने वाले रांड तक कह डालते हैं।पति जुवारी शराबी जैसा भी है किंतु सुहागिन का सुहाग है।
  रात दिन की कट कट से बहू भी परेशान हैं।वह पति से सास की सारी बुराई कह उसके कान भर देती है सारी सहेलियों से सास सम्बाद  करना एक क्लास के पीरियड की तरह है।वह तो अच्छा है जो मेरे पति मेरी बात पर यकीन कर लेते हैं अन्यथा मैं भी फोन पर तीन तलाक ले लेती। पत्नी अपनी सासु की बुराई पति से कर सकती है किंतु पति सासु की बुराई पत्नी से नहीं कर सकता।
पिता पुत्र का रंग भेद भी ऐसा ही है, जरूरत पूरी न होने पर पैदा ही क्यों किया। पढ़ाना लिखाना तुम्हारा कर्तव्य था कौन सा एहसान कर दिया। शादी के लिए मैंने कब कहा तुमने अपनी मर्जी और सेवा के लिए की। बेटे की नजर पिता की चेन और अंगूठी पर है बहू की नजर भी सासु मां  जेवरात पर ही टिकी है। अधिकार चाहिए, कर्त्तव्य कौन निभाएगा यह एक सामाजिक रोग हो गया है। माता पिता कब तक बलबेदी पर चढ़ते रहेंगे।

यह समझना आवश्यक है कोई हमारे माता-पिता हैं हम भी माता पिता बनेंगे। सास भी बहू थी बहू भी सास बनेगी।
इन परिवर्तनों को जिसने समझ लिया वहां बाहरी शक्ति कुछ नहीं कर सकती। न नौ मन तेल होगा,न राधा नाचेगी।
जहां प्यार होगा। वहां न बांस होगा , नहीं बांसुरी बजेगी।
ईश्वर सब के घरों में शांति,खुशी और सम्पन्नता बरसाए।इसी के साथ सादर नमन।