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"भारतीय चेतना की अप्रतिम ऊर्जा है- वाल्मीकि का रचना संसार "
April 27, 2020 • सुरेखा शर्मा • साहित्य

सुरेखा शर्मा, लेखिका /समीक्षक

पुस्तक ---वाल्मीकि का रचना संसार भाग-१ व भाग-२
लेखक -डाॅ• सत्यपाल शर्मा 
प्रकाशक -समाज धर्म प्रकाशन (94,औद्योगिक क्षेत्र,                                                                      महतपुर-174315  जिला ऊना,हिमाचल प्रदेश )
प्रथम संस्करण : 2019.मूल्य -450/- रुपये मात्र 

 वाल्मीकि नारद से पूछते हैं कि इस लोक में कौन ऐसा महामानव है जिसे मैं अपने महाकाव्य का नायक बनाऊँ।इस पर नारद कहते हैं--
             बहवो दुर्लभाश्चैव येत्वया कीर्तिता गुणा:।
           मुने वक्ष्याम्ह्यं बुद्धवा तैर्युक्तः  श्रूयतां नरः।।
अर्थात् उन दुर्लभ गुणों की खान एक महामानव का मैं विवरण देता हूँ जिनकी परिकल्पना आपने की है । इस प्रकार एक महामानव के रूप में श्रीराम   का आदर्श चरित्र रामायण का वर्ण्य है। रामायण में निबद्ध यह रामकथा इतनी अलौकिक सिद्ध हुई कि श्रीराम को परम पुरुष, ब्रह्म, घर --घर में व्यापी परमात्मा माना जाने  लगा । 

वरिष्ठ साहित्यकार डाक्टर सत्यपाल शर्मा साहित्यकारों व लेखकों की श्रेणी में शीर्ष स्थान रखते हैं। उन्होंने अपने बहुकृतिक साहित्य - सर्जन से जो देश व्यापी पहचान बनाई है वह किसी भी रचनाकार के लिए गौरव का विषय हो सकता है । विशेष उल्लेखनीय यह है कि महाकाव्य /खंड काव्य तथा ऐतिहासिक ग्रंथों की क्षीण से क्षीणतर होती गई परम्परा को अपनी सर्जना से एक विशेष गुणवत्ता प्रदान की है । उन्हें  कवि और कथाकार के रूप में जाना जाता है ।इनके अब तक पांच कहानी संग्रह, गुरुबाणी सुधासार,निबंध संग्रह, कालिदास का रचना संसार के साथ- साथ महाभारत युगीन युद्धतंत्र आदि तीन ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं।

सद्यप्रकाशित  'वाल्मीकि का रचना संसार ' -वाल्मीकि रामायण का सामाजिक सांस्कृतिक अध्ययन ' एक ऐसा अनूठा संग्रह है जिसके विषय में जितना कहा जाए उतना कम है। रचनाकार की जन्मभूमि स्यालकोट और कर्मभूमि हिमाचल प्रदेश  रही । ग्रामीण पृष्ठभूमि होने के कारण वहां की संस्कृति उनकी रचनाओं में रची बसी है ।   साहित्यकार अपनी रचनाओं के द्वारा उस यथार्थ की ओर लेकर चलता है  जिसकी तरफ किसी का ध्यान नही जाता।ऐसा ही ये संग्रह पढ़कर लगा । भारतीय संस्कृति व साहित्य क्षेत्र में वाल्मीकि जी का महत्त्व कालजयी साहित्यकार के रूप में संपूर्ण जगत में मान्य है । उनके रचना संसार ने भारतीय जीवन पद्धति  संस्कृति एवं जीवन मूल्यों की स्थापना में जो योगदान दिया  है उसने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को महलों से ले जाकर झोंपड़ियों,वनांचलो एवं गिरी कंदराओं तक में बसने वाले जन -जन का नायक बनाकर संपूर्ण विश्व में स्थापित किया है।

कलिकाल के वाल्मीकि और कविकुल शिरोमणि महात्मा तुलसीदास असाधारण प्रतिभाशाली कवि थे।जिन्होंने स्वान्तः सुखाय लिखकर उसे जनहिताय बना दिया । वाल्मीकि यथार्थदर्शी हैं अपने समय के सामाजिक परिवेश को जैसा देखा वैसा ही रामायण में चित्रित किया ।कहीं पर भी मान्यता नही थोपी।न ही कृत्रिम रूप से रूचिकर बनाया ।महर्षि वाल्मीकि के राम साहसी और पराक्रमी महापुरुष हैं , वह परिस्थितियों से हार मानने वाले नही,पर आखिर हैं तो वे भी मन- प्राण और सोच रखने वाले मनुष्य ही न ! इस प्रकार मनुष्योचित कमजोरी  तो महसूस करते ही हैं। आदिकवि ने अन्य पात्रों को भी सही मन-प्राण वाले चरित्र  दिखाया है । राम ऐसे ही कथानायक हैं।बल,पराक्रम साहस और जीवट के रहते हुए भी मनस्वी पुरुषों को कई बार परिस्थितियाँ व चिंता घेर लेती हैं।हमारी पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब कुछ शुभकार्य होने होते हैं तो अच्छे शकुन होने लगते हैं और जब कुछ बुरा होने वाला होता है तो अपशकुन होने लगते हैं।ऐसा ही कुछ श्री राम के साथ हुआ ।जब वे माया मृग मारीच को मार कर आ रहे हैं तो उन्होंने कई अपशकुन देखे।
         अशुभं बत मन्ये अहं गोमायुर्वाश्यते यथा
         स्वस्ति स्यादपि वैदेह्या राक्षसैर्भक्षणं बिना।

वे डरे हुए हैं।उनके मन में अशुभ विचार आते हैं।उन्हे लगता है कि अवश्य ही कोई अशुभ घट गया है।इस प्रकार राज्य से निष्कासित कर दिए गए राम प्रिय पत्नी से भी हाथ धो बैठे हैं तो उनकी क्या दशा हुई  होगी,ये बताने की आवश्यकता नहीं। उन्हें अवतारी विभूति के रूप में चित्रित करने वाला कोई भक्त कवि नहीं केवल वाल्मीकि ही दिखा सकते थे । रामायण ऐसी कालजयी और चिरनूतन रचना है जिसे जितनी बार पढ़ो उतनी बार नया रस और नई दृष्टि प्राप्त होती है।  "यावत स्थास्यन्ति महीतले।"     रचनाकार ने अपनी पैनी  दृष्टि से इसे देखकर  ,पढ़कर  और गुनकर हमारे हाथों में सौंपा। दो खंडों में विभाजित  यह रचना संसार 45 शीर्षकों से विभूषित है। जिसमें संपूर्ण रामायण समाहित है ।लेखक की लेखनी से कोई विषय नही छूटा । प्रथम खंड में 'रामकथा  के अमर गायक आदि कवि  वाल्मीकि शीर्षक से लेकर रामायण की अलंकृत भाषा में शीर्षक तक समेटे हैं। जो रामायण कथा के अलग-अलग पक्षों को  विश्लेषित और उद्घाटित करते हैं।विशेष बात तो ये है कि डॉक्टर सत्यपाल शर्मा इन लेखों में पूर्व स्थापित तथ्यों या मान्यताओं का पिष्टपोषण नही करते ,अपितु  नये बिन्दु उद्घाटित कर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।

आदि कवि ने हमें जो संस्कृति दी है और जिसके आधार स्तम्भ मर्यादा पुरुषोत्तम राम है उसे समय के झंझावात तनिक भी क्षति नही पहुँचा पाए। श्री राम के रूप में हमें एक ऐसा महानायक मिला है जो जीवन के हर क्षेत्र में हमारा पथ प्रदर्शन  करता है। '  महाकारूणिक राम,पिता को सत्यवादी सिद्ध करने पर दृढ़, कैकयी के हितचिन्तक,  मर्यादापालक पुत्र, अद्भुत क्षमाशील, शत्रुओं के भी प्रशंसापात्र,दृढप्रतिज्ञ दण्डधारी राम,संकटों के झंझावातों में उभरता व्यक्तित्व, स्नेही भाई के रूप में श्रीराम ,स्थितप्रज्ञ महामानव,एक पत्नीव्रत धर्म के पालक जैसे महर्षि वाल्मीकि ने अपने समय में लोकमुख पर चढ़ी हुई  रामकथा में से  ऐसे प्रसंग बड़े आग्रह से चुने हैं । रामायण कालीन समाज में राजन्य वर्ग बेशक अपनी निरंकुशता और भोगलिप्सा के कारण  बहुपत्नीप्रधान रहा हो मगर जनसाधारण के बीच बहुपत्नीत्व एक वर्जना के रूप में ही रहा होगा । कवि समुदाय प्राय: उन्हीं को पुष्ट और प्रचारित -प्रसारित करने के लिए उन पर अपनी मान्यता की छाप लगाने के लिए ही ऐसी कल्पना का ताना- बाना बुनता है ।कवि कल्पना हवा से नही आती ,समाज में जिन बातों का चलन होता है अथवा जिन मूल्य -मान्यताओं और जीवन पद्धतियों का प्रचार हो रहा होता है ,कविजन उन्हीं को अपनी कल्पना शक्ति से पुनः पुनः रचते हैं।
            'न सर्वे भ्रातरः भरतोपमा:
         मद्विधा व पितु:पुत्रा: सुहृदो वा भवद्विधा:।        

अर्थात् श्री  राम कहते हैं-'सुग्रीव , विभीषण को आने दो उसे अपने भाई से खतरा हो सकता है ।सब भाई भरत जैसे नहीं होते।' भरत का तप -त्याग  महर्षि वाल्मीकि ने राम वनगमन की कथा को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है भरत का तप-त्याग और भ्रातृ -प्रेम से भरपूर  समूचा व्यक्तित्व हमारे सामने जगमगाने लगता है । लक्ष्मण राम से कहते हैं  सुख समृद्धि में पले हुए सुकुमार भरत रात को ठंड में आप ही की तरह  जमीन पर सोत हैं ,वह किसी प्रकार की शैया का प्रयोग नहीं करता ---
         त्यक्तवा राज्य॔ च मानं च भोगांश्च विविधान् बहुन् ।
        तपस्वी नियताहारः शेते शीते महीतले।।
इसी प्रकार वे लक्ष्मण के समर्पणमय भ्रातृभाव के लिए निषादराज गुह कहते हैं---लक्ष्मनेन यदानीतं पीतं वारि महात्मना।
              औपवास्यं तदाकार्षीद राघवःसह सीतया।।
              ततस्तु जलशेषेण लक्ष्मणअप्यकरोत् तदा।
             वास्यतास्ते त्रयः संध्यां समुपासन्त संहिता:।।                       

अर्थात् जब सीता और राम विश्राम करने के लिए बैठे तो लक्ष्मण ने  उन्हें पीने के लिए पानी लाकर दिया ।जब वह पी चुके तो बचा हुआ  पानी उसने पीया फिर श्री राम और सीता के चरण धोए। रामायण की रामकथा भारतीय चेतना की अप्रतिम ऊर्जा है ।वाल्मीकि से से लेकर तुलसीदास और आधुनिक में  निराला से लेकर मैथिलीशरण गुप्त ने रामकथा को समसामयिक प्रशप्रश्नों नों से जोड़ा।आज भी ऐसे प्रयास जारी हैं।रचनाकार जितना अनुभूति प्रवण, कल्पनाशील और काव्य शक्ति  संपन्न होगा रचना उतनी ही समर्थ होगी। रामकथा की विभिन्न केन्द्रीय घटनाओं को केंद्र बिंदु बना कर खंड काव्य रचे गए ।पंचवटी, शबरी जैसे इसी विचारधारा के उदाहरण हैं। 'पतितपावनी सीता ' के चित्रण में महर्षि वाल्मीकि ने बहुत सार्थक प्रतीकों का प्रयोग किया है ।भावाभिव्यक्ति के लिए जब शब्द असमर्थ प्रतीत होने  लगते हैं तो कविजन प्रतीकों का प्रयोग करते हैं।शब्द कई बार अर्थ की गरिमा और विशालता को पूरी तरह वहन नही कर पाते तो रचना में प्रतीकों का प्रयोग चमत्कार उत्पन्न कर देता है । सीता की पति-परायणता,सत्यवादिता,निश्छलता, सहिष्णुता, आदर्श प्रियता ,उदारता आदि गणों को केंद्र में रखकर ही कहा गया है।वह एक विवेकशील, कर्तव्यपरायण और संबंधों की मर्यादाओं को समझने वाली नारी है। उसे शिक्षा प्रदान करने की आवश्यकता नहीं। वे कहती हैं----
           'आर्यपुत्र पिता माता भ्राता पुत्रस्तथा स्नुषा।
       स्वानि पुण्यानि भुञ्जाना: स्वं स्वं भाग्यमुपासते।।
            भर्तुर्भाग्यं तु नार्येका प्राप्नोति पुरुषर्षभ।
        अतश्चैवाहमादिष्टा वने वस्तव्यमित्यपि।। 

अर्थात् आर्यपुत्र आपको ज्ञात होना ही चाहिए कि पिता माता भाई, पुत्र और पुत्रवधू ये सब अपने-अपने पुण्यों का फल भोगते हैं और अपने-अपने भाग्य को प्राप्त करते हैं परंतु पत्नी अपने पति के भाग्य के अनुसार चलती है ।अतः आपको समझना चाहिए कि आप वन जाने का दिया आदेश मुझ पर भी लागू होता है । इस प्रकार सीता भारतीय समाज परम्परा का विधिवत् निर्वाह करने वाली नारी है। राम और कृष्ण भारतीय संस्कृति के  दो ऐसे महिमा मंडित असाधारण व्यक्तित्व हैं जिनकी कथाओं को लेकर  रामायण तथा महाभारत के अलावा विभिन्न भाषाओं में अनेक ग्रंथों की रचना समय समय पर कृतिकार करते आ रहे हैं।युग और परिस्थिति के अनुरूप कृतिकारों ने अपनी कल्पनाओं से नए आयाम भी प्रदान किए हैं।   'रामायण के मानवेतर पात्र'  के शीर्षक के अन्तर्गत उन पात्रों का वर्णन किया है जिन्होंने अपना दायित्व निभाने के लिए अपने प्राणों की भी बाजी लगा दी थी।हनुमान, सुग्रीव, बाली, तारा, अंगद, नल, सुषेण ,जटायु आदि।दैहिक बल और आत्मिक ऊर्जा से संपन्न ये पात्र हर उस नैतिम नियम, सामाजिक मर्यादा और मानवीय भाव बोध का पालन करते हैं जिनके लिए प्रायः मनुष्य समाज ही नियत माना जाता है । फादर कामिल बुल्के ने अपनी पुस्तक रामकथा उद्भव और विकास  में लिखा है रामायण के वानर मनुष्यों की तरह बुद्धि संपन्न हैं।
           रामायण काल में मल्लयुद्धों का भी खूब चलन था ।रामायण के युद्धकाण्ड चालीसवें  सर्ग में सुग्रीव और रावण के बीच हुए युद्ध का बखूबी विस्तार से वर्णन किया है । कोई भी विषय रचनाकार की दृष्टि से ओझल नही हुआ ।सभी पर बेबाकी से  लेखनी चली है। किष्किन्धा काण्ड में वसंत ऋतु का वर्णन बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है । सीताहरण के कारण श्रीराम अत्यंत शोकाकुल हैं फिर भी वह शस्य श्यामल भूखंड पर पम्पासरोवर की तटभूमि के चहुंओर सर्वत्र दिखाई देने वाली पुष्प-फल समृद्धि के प्रति आसक्ति दिखाते हैं। शोकाकुल होते हुए भी  लक्ष्मण से कहते हैं- 
          शोकार्तस्यापि मे पम्पा शोभते चित्रकानना।
          व्याकीर्णा बहुविधै: पुष्पै:, शीतोदका शिवा।।                                         

आदिकवि के साथ -साथ कवि कालिदास ने भी वसंत का पूरे मनोयोग से ऋतुसंहार के छठे सर्ग में व कुमारसम्भव के तीसरे सर्ग में वर्णन किया है । कालिदास ने केवल श्रृंगार रस के संयोग को ही लिया है और वाल्मीकि ने संयोग व वियोग रस के दोनों पक्षों को लिया है ।इस प्रकार प्रकृति के अंग -संग रहते हुए हर ऋतु का वर्णन किया है । श्रीराम  वर्षा ऋतु के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर तो देखते हैं पर घने काले बादलों के में रह रहकर चमकने वाली बिजली  देखकर उन्हें लगता है कि हरी जाती हुई सीता रावण की पकड़ में ऐसे ही छटपटा रही होगी---- नीलमेघाश्रिता विद्युत स्फुरन्ती प्रतिभाति मे।
             स्फुरन्ती रावणस्या अंके वैदेहीव तपस्विनी।। कि• २८•१२
इस तरह  शरद,हेमंत ऋतु का मनोहारी चित्रण चित्रित किया है । 'रामायण की झलकियाँ अलंकृत भाषा में'। शब्दालंकारों और अर्थालंकारों का प्रयोग बखूबी किया गया है । कुछ रचनाकार शब्द शिल्पी होते हैं जो केवल शब्दालंकारों पर बल देते हैं अत: उनकी रचनाओं में अर्थतत्व छूट जाता है । दैहिक सौष्ठव होता है , गहने तभी शोभा बढ़ाते हैं। रचना में शब्द और अर्थ एक दूसरे के पूरक होते हैं। अतः आदि कवि ने रामकथा के दिग्विजयी स्वरूप को उजागर करने वाले रचनाकार होने के नाते चमत्कार के चक्र में न पड़कर अर्थतत्व पर ही अधिक ध्यान दिया है ।
             वाल्मीकि की यह रामकथा सदियों से भारतीय जनजीवन का कंठहार बनी हुई है । रामकथा के प्रथम गायक वाल्मीकि स्वयं एक पात्र हैं।  इसमें कोई संदेह नही कि  रचनाकार डाक्टर सत्यपाल शर्मा द्वारा  वाल्मीकि से लेकर अब तक लिखे गए रामकथा साहित्य का गहन अध्ययन किया गया है, फिर उसमें से अमर कथा रत्नों को चुन-चुनकर ऐसा गूंथा कि उनका यह प्रयास अत्यंत सार्थक,  महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बन गया । राक्षस समाज की संस्कृति और परम्परा वृहत्तर भारतीय समाज की सभ्यता और संस्कृति से भिन्न नही । उसके विश्वास और उसकी सामाजिक परमराएँ कुछ अलग तरह की नहीं हैं। रावण को ही ले लीजिए वह संस्कृतका प्रकांड पंडित है।यही नहीं रावण की धर्म पत्नी मंदोदरी ने अपने पति रावण के मारे जाने पर विलाप करते हुए कहा है---
           प्रवादः सत्यमेवायं त्वां प्रति प्रायशो नृप।
         पतिव्रतानां नाकस्मात् पातयन्त्यश्रूणि भूतले ।। युद्धकाण्ड१११.६६-६७
अर्थात् पतिव्रताओं के आँसू इस पृथ्वी पर व्यर्थ नहीं गिरते।
           यह चमत्कार भी क्या आश्चर्यजनक नहीं कि वाल्मीकि ने जिस महापुरुष की गाथा महामानव के रूप में,मानवीय गुणों के आदर्श के रूप में,जनमनस में आराध्य के रूप मे अपने कालजयी काव्य में गाई थी वह वेदकालीन देवताओं से भी बढ़कर भारतीय जनमानस में परम आराध्य
 देव के रूप में,परमात्मा के रूप में स्थापित हो गया ?  पर्यावरण हमारी संस्कृति का एक अभिन्न अंग रहा है ।भारतीय संस्कृति में यज्ञ को पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावशाली साधन माना गया है । रामायण काल का समाज अपने पर्यावरण के साथ सदैव एक सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखता है ।कभी वन्यजीव और वन्य संपदा के साथ छेड़ -छाड़ करके हानि नही पहुंचाई

सम्प्रेषणीयता,शिल्प और भावानुभूति की प्रामाणिकता इस कृति की विशिष्टता है। कलेवर के साथ-साथ मुखपृष्ठ, संयोजन कृति के विषयों भांति ही उत्कृष्ट है। वर्तमान संक्रांति काल की विभीषिका  और विकृतियों को दूर करने में रचनाकार का संदेश नई पीढ़ी को प्रेरणा देने योग्य है ।कृति की सरसता ,सरलता, सहजता एवं स्वाभाविक प्रवाह पाठक को अपने साथ ले चलने में समर्थ है ।आज की युगीन परिस्थतियों में वाल्मीकि के रचना संसार की उपादेयता है।लेखक बधाई के पात्र हैं जिन्होंने संपूर्ण रामायण के महत्वपूर्ण प्रसंगों को युगपत प्रस्तुत कर रामकथा की लोकधर्मिया को सहज ढंग से समझाया है ।जीवनोपयोगी श्लोकों को प्रस्तुत कर रामायण की जन -जीवन में अपेक्षित उपयोगिता को रेखांकित किया है । इसके पठन -पाठन से आचरण का सम्यक् परिष्कार हो सकेगा और हम एक स्वस्थ, धर्म अध्यात्म प्रेरित समाज -संरचना में सहायक हो सकेंगे। डॉ• सत्यपाल शर्मा के स्वस्थ, निरामयय एवं सक्रिय, सर्जनात्मक भावी जीवन के लिए हार्दिक मंगलकामनाएँ।