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 क्या बोले रे जोगी
May 9, 2020 • वी0 एस0 बिष्ट • साहित्य

वी0 एस0 बिष्ट

क्या बोले ये जोगी,
तेरी वीणा का इकतारा,
तारा बोले छोड़ दे जोगी,
माया का चौबारा।

दर दर भटके कहीं न अटके,
नदिया की ज्यों धारा,
ठाठ पड़ा सब रह जाता है,
कूच करे जब बंजारा।
दुनिया की यह भूल भुलैया,
इसका आर न पारा।
माया महाठगिनी साधु,
नामुमकिन छुटकारा।
शूरा ज्ञानी शाह रंक को,
इसने चुन चुन मारा।
क्या बोले रे जोगी ,
तेरी वीणा का इकतारा।

राज गये दरवार गये,
औ खाक हुआ सरमाया,
जोड़ी लाखों की थी माया,
साथ न कुछ ले पाया।
माया के चक्कर में फंसकर,
मिलता है सम्मान नहीं,
नशा चढ़े जब दौलत का तो,
रहता फिर कुछ ज्ञान नहीं,
रानी ज्ञानी के चक्कर में,
खत्म हुआ दरवारा।
क्या बोले रे जोगी ,
तेरी वीणा का इकतारा।

झूठे रिस्ते झूठे नाते,
झूठ का ये बाजारा,
जैसे आए वैसे जाए,
छूटे सब संसारा,
चलती फिरती इस मंडी में,
बसे नहीं घरबारा,
फिर क्यों…

जाने कितनी बार बनी होगी बिगड़ी होगी बस्ती,
मिट्टी में है आखिर मिलती सबकी एक दिन हस्ती,
आनी जानी दुनिया है ए,
चार दिनों का मेला,
ज्ञानी है वह हंस हंस करके,
सुख-दुख इसके झेला,
प्यार से रहना और बनाए रखना भाईचारा।

क्या बोली रे जोगी तेरा इकतारा।
आंख खुली तो जागा जोगी,
देखा फिर संसारा,
साबुन से पहले खोजा उसने,
अपने मन का द्वारा,
द्वार खुला तो फैला मन के,
आंगन में उजियारा,
तब् समझा वो कैद किया था,
अपना ही अंधियारा।
छोड़ यहां के सारे रिश्ते,
और नहीं है चारा।
क्या बोली रे जोगी तेरी वीणा का इकतारा।

फूल उगाए जिनके खातिर,
कांटे वही बिछाते,
महल बनाये जिनके खातिर,
मरघट में ले जाते,
पेड़ उगाए फल है लेकिन,
कभी नहीं खुद खाते,
दुनिया को जल देते बादल,
खुद प्यासे रह जाते,
कहीं फकीरा गोरख धंधा,
यह मालिक का सारा।
क्या बोली हे जोगी तेरी वीणा का इकतारा।

जोगी भोगी ज्ञानी, ध्यानी राजा हो या रानी,
इस ,
ठगनी के जाल में है धरती अंबर पानी,
सेठ बड़ा वह नगरी 
का है नचा रही सेठानी,
ज्ञानी डूबा ज्ञान घाट पर पार हुआ अज्ञानी,
माया के इस जाल को ना कोई जानन हारा,
क्या बोली रे जोगी तेरी वीणा का इकतारा।

चक्की के पाटों में फंसकर, साबुत बचा न दाना,
सिर को पीटा खाली लौटा जो था बड़ा सयाना,
बिन  मांगे हैं मोती मिलते, मांगे मिले न भीखा,
पोथी सारी पर डाली पर, पंडित कुछ ना सीखा,
प्रेम की पोथी पढ़ ली जिसने, मिला उसे गुरुद्वारा।
क्या बोली रे जोगी तेरी बीणा का इकतारा।

माया ठगनी से ना अब तक, कोई भी बच पाया, पिसकर दाना चूरा होता, जो चक्की में आया,
महल चौबारे यहां बनाये, जोड़ा था सरमाया,
खाली हाथ सिकंदर लोटा, अंत समय पछताया,
जीता जिसने मन को उससे, सारा जग है हारा।
क्या बोली रे जोगी तेरी वीणा का इकतारा।

जैसी करनी वैसी भरनी, बोले ढोल मंजीरा,
अपने कर्मों से तू लिखता, अपना ही तकदीरा,
जैसा बोया वैसा काटा बोले  संत कबीरा,
अमर हुई थी कि  विष पी कर के, श्याम दीवानी मीरा,
माटी जन्मे माटी मारे, माटी काल बसेरा।
क्या बोली रे जोगी तेरी  वीणा का इकतारा।

माया बढ़ती जाए जितनी, बढ़ता ठाटमठाठ,
सुख के खातिर जितना जोड़ो, होता सुख का घाटा,
मेहनत औ सच्चाई से है, जीवन जिसने काटा, उसके सुख को तरसा करते, बिड़ला ,मोदी टाटा,
कहें कबीरा प्रेम वचन ही ज्ञानी का भंडारा,
क्या बोली रे जोगी  तेरी वीणा का इकतारा।
बेटा एक फकीरा का है, दौलत बौराये,
पैदल से है फर्जी बनकर, टेढ़ा मेढा जाए,
दुनिया ऐसा एक अजूबा, समझ न कोई पाये,
सच्चे ठोकर खाते रहते, पापी मौज उड़ाए,
अच्छा क्या है और बुरा क्या, कौन करे निपटारा।
क्या बोली रे जोगी तेरी वीणा का इकतारा।