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" लाल चुनरी "
April 1, 2020 • सुरेखा शर्मा • साहित्य

सुरेखा शर्मा ,लेखिका /समीक्षक


"जोर से बोलो ,जय माता दी,  सारे बोलो••• जय माता दी, मैं नहीं सुणया जय माता दी •••जयकारा ए शेरां वाली दा••••"आगे से किसी भक्त ने जोर से आवाज लगाई तो पीछे से भी सुर में सुर मिल गया और सब जोर से बोल पड़े " बोल साँचे दरबार की जय••••।"    देवी माँ के  नवरात्रों में  मनसा देवी माँ के मन्दिर में धूम मची थी।माता के भक्तों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी ।दर्शन करने वालों की कतार लंबी होती जा रही थी।भीड़ मेें फंसी 70-75 साल की वृद्धा अपनी आठ दस वर्ष की पोती के साथ  कतार में लगी हुई थी ।भीड़ को देखकर लग रहा  था आज ही दर्शन करके माँ की कृपा बरसेगी सभी पर।
   

अभिनव भी अपनी माँ और बहन के साथ रात के दो बजे से दर्शन के लिए  में खड़ा था ।दर्शनार्थी थे कि आगे सरक ही नही रहे थे।उसे स्वयं पर गुस्सा भी आ रहा था कि क्यों नहीं मम्मी और दीदी को मना कर सका।जबकि आज उसकी बहुत ही जरूरी मीटिंग थी।नई -नई नौकरी लगी थी।समय पर नहीं पहुंचा तो क्या प्रभाव पड़ेगा ।मम्मी के आदेश को वह टाल न सका इसलिए उसे आना पड़ा ।मम्मी को विश्वास था कि यह नौकरी माता की कृपा से ही लगी है।सो वह उनके विश्वास को तोड़ना नही चाहता था , ना ही मन दुखाना चाहता था । मन में एक ही ख्याल आ रहा था कि इतनी भीड़ में आने कि बजाए किसी और दिन अंबे माँ को हलवा पूरी और लाल चुनरी चढ़ा जाता।क्या दुर्गा माँ आज ही अपने भक्तों को दर्शन देंगी ? आज ही पूजा स्वीकार करेंगी? पता नही मम्मी और दीदी इन बातों पर कब तक विश्वास करती रहेंगी? यही सोचकर वह दुखी-सा हो रहा था ।चलो , अब आ ही गया है तो माँ को हलवा पूरी का प्रसाद और लाल चुनरी चढ़ा कर ही जाएगा ।
कतार में खड़े चार घंटे से ज्यादा का  समय हो गया था ।अभी 20-25 कदम ही आगे बढ़े होंगे ।पीछे से धक्के पे धक्के लगे जा रहे थे ।हर धक्के के साथ माँ के जयकारे का स्वर भी गूंज उठता ।उसे अपनी चिंता नहीं थी,चिंता थी तो अपने आगे खड़ी वृद्धा व उस बच्ची की जिसका भूख-प्यास  से चेहरा कुम्हला गया था ।थकान उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी ।जिस कारण उससे खड़ा भी नही हुआ जा रहा था।पुन: जयकारे की गूंज के साथ भीड़ दो कदम आगे बढ़ी।
         

प्रात:के चार बजने वाले थे।भक्तों की इच्छा थी कि आरती के समय माँ के दरबार में उनकी हाजिरी लग जाए।उसी क्षण घंटा ध्वनि  ने माँ की आरती का ऐलान कर दिया ।बस ,फिर क्या था आगे बढ़ने के लिए लोग एक दूसरे को धकेलने लगे ।हर भक्त आरती का आनन्द लेना चाहता था।मम्मी कुछ आगे सरक गईं थी ,पीछे मुड़-मुड़कर मुझे खड़ा देखकर आश्वस्त हो जाती । 
भीड़ का कोई अंत नही था।इतनी ज्यादा भीड़ देखकर मन आस्था- अनास्था में भटक गया ।पता नही माँ दुर्गा को भी क्या आनन्द आ रहा होगा इतनी भीड़ देखकर ।वैसे तो अम्बे माँ के दर्शन  हर रोज करने चाहिएँ ।लगता है माँ को आज ही नारियल ,हलवा पूरी और लाल चुनरी चाहिए ।कतार में खड़े  जयकारा लगाते हुए सभी माँ के परम भक्त दिखाई दे रहे थे ।लग रहा था जैसे आज के बाद ये कोई बेईमानी नही करेंगे, ना किसी की हत्या ना चोरी- चकारी,न भ्रूण हत्या, ना बालिकाओं पर कुदृष्टि डालेंगे ।आए दिन समाज में घटित हो रही घटनाएँ  बंद हो जाएंगी और पराई स्त्री को माँ-बहन का दर्जा देंगे ।वह यही सब सोच रहा था कि तभी पीछे से एक व्यक्ति ने धक्का देते हुए कहा, "ओ भाई साहब, कहां खो गए? आगे बढ़ो,देखो आपके आगे के लोग पांच कदम आगे बढ़ गए हैं ।" "अरे भाई, माफ करना ध्यान ही नही रहा।" अपने विचारों को झटका देकर आगे बढ़ा।ज्यों -ज्यों गुफा का द्वार नजदीक आ रहा था ।माँ के भक्तों का जोश भी दुगुना होता जा रहा था।माँ के भक्त  जोर-शोर से जयकारा लगा रहे थे।अधिक भीड़ होने के कारण तथा माँ के द्वार तक पहुंचने का रास्ता अति संकरा होने से गर्मी का एहसास होने लगा था और पसीने की दुर्गंध ने भी अपने पांव पसार लिए थे ।तभी वहाँ आठ दस साल की बच्ची बेहोश होकर गिर पड़ी ।वह रात से भूखी- प्यासी थी।भीड़ उसे छोड़कर आगे बढ़ने लगी , बल्कि उसके ऊपर से लाँघकर भक्तजन बढ़ते गए ।किसी ने उसे अपने पास से कुछ खाना देना भी जरूरी नही समझा।वह बहुत देर से अपनी दादी से खाने को माँग रही थी ।दादी के पास फल व हलवा पूरी था।जब उसने दादी से कहा,'दादी मुझे चक्कर आ रहा है, कुछ खाने को दे दो ना!'
             

"बेटी थोड़ी देर की ही बात है, और माता के प्रसाद में से कैसे दे सकती हूँ ?" यह सब सुनकर वह समझ गया था कि वृद्धा 'देवी माँ' के प्रकोप से भयग्रस्त है ।
         उसने बिना समय गंवाए नारियल फोड़ा और उसका पानी बच्ची के मुँह में डाला,क्योंकि वहाँ पानी पीने की कोई व्यवस्था नहीं थी।थोड़ा होश आते ही बच्ची बोली,''दादी बहुत भूख लगी है।"  "बस बेटी, थोड़ा और इन्तजार कर लो,जहां तुमने सात दिन के व्रत  रखे वहां दो चार घंटे और हिम्मत रख लो।" दादी ने बहुत ही दया दिखाते हुए कहा । 
          'व्रत और इतनी छोटी बच्ची से ?' सुनकर वह हैरान हो गया ।उसने  उसे सहारा देकर उठाया और भीड़ से हटकर पंक्ति से अलग खुली हवा में बिठा दिया ।मन- ही- मन सोचने लगा कि मम्मी तो घर बुलाकर कन्याओं को प्रसाद खिलाती हैं,तो मैं क्यों न आज अपने हाथ से इस कन्या को पूरी हलवा खिला दूँ ? बल्कि यह देवी तो खा भी लेगी,अन्दर वाली पाषाण मूर्ति तो खा भी नही पाएगी।ऐसा  सोच कर उसने हलवा पूरी का एक ग्रास खिला दिया ।उसे खाते देखकर असीम सुख की अनुभूति की।तभी उसकी दादी ने देखा तो क्रोधित होकर माथे पर हाथ मारते हुए बोली, "सत्यानास हो तेरा,अभागिन, करमजली ये तूने क्या किया ,अब हमारी मन्नत कैसे पूरी होगी ? हे माता रानी •••अब मैं क्या करूँ!"
       

"अम्मा आप इस को क्यों अभागिन कह रही हैं ?प्रसाद तो मैंने खिलाया है।मुझे सजा मिलेगी माता रानी से।यह तो स्वयं एक देवी का रूप है।" उसने वृद्धा को समझाना चाहा।
      "बस ••बस ज्यादा होशियार मत बन।इसे अभागिन न कहूँ तो क्या कहूँ ?करमजली अपने पीछे तीन -तीन बहनों को लेकर आई हुई है ।" वृद्धा माथे पर हाथ रखकर अफ़सोस करते हुए बड़बड़ाती रही, ''बहनों के भाग्य से ही तो भाई होता है।लगता है इस जन्म में तो पोते का मुँह  नहीं देख सकूंगी मैं।इसी इच्छा से तो व्रत करवाए थे इससे? " वे विलाप करती जा रही थी।उसे गुस्सा तो बहुत आया, पर माँ समान अम्मा को कुछ कहना अनुचित लगा ।मन-ही-मन रूढ़िवादी समाज की सोच पर दुखी होता रहा।लाईन में पुन: धक्का -मुक्की शुरू हो गई ।
       

माँ का द्वार अब मुश्किल से मात्र 100 कदम की दूरी पर था,लेकिन लाईन चलते-चलते फिर रुक गई । पूछने पर पता चला कि मन्दिर के पट कुछ देर के लिए  बंद कर दिए गए हैं क्योंकि माँ का  श्रृंगार  किया  जा रहा है । एक सेठ माँ का श्रृंगार करना चाहते हैं।यह भी सुना गया कि माँ के परिधान के साथ-साथ उसने सोने का मुकुट भी माँ को पहनाना है।इतना सुनना था कि भीड़ गुस्से से बेकाबू हो गई । तभी एक सुरक्षा गार्ड व सिपाही सीटी बजाता हुआ लाईन बनवाने लगा।भीड़ थी कि बढ़ती जा रही थी , जो लोग रात्रि के बारह बजे से खड़े थे उनकी सहन शक्ति खत्म होती जा रही थी ।सिपाही ने डंडे के जोर पर लोगों को कतार में खड़ा करना चाहा और सेठ को द्वार तक पहुंचाने के लिए रास्ता बनाने लगा । सेठ अपनी मस्त चाल से आगे बढ़ता जा रहा था और पूजा की सामग्री एक वर्दीधारी गार्ड लेकर चल रहा था । माँ के दर्शनार्थियों को एक घंटा और इन्तजार करना पड़ेगा । यह सोचकर वह लाईन में से बाहर  निकलकर एक ओर बैठ गया ।
                  कुछ ही देर के बाद माँ का विशेष भक्त वी• आई• पी• सेठ गर्व से गर्दन उठाए दर्शन करके बाहर आया ।उसकी गरिमा उसके परिधान से स्पष्ट झलक रही थी ।सिल्क का कुर्ता -धोती पहने, सोने के फ्रेम वाला चश्मा, हाथ में सोने की मूठ वाला डंडा लिए जैसे ही गार्ड के साथ बाहर निकला तो मंदिर का पट खोल दिया गया । भीड़ को देखते हुए दरबार के दोनों ओर के द्वार जैसे ही खोले  गये बस फिर क्या था, आधी रात से खड़े भूखे- प्यासे भक्तजन एक दूसरे को धकेलते हुए आगे बढ़ने लगे ।मंदिर की सीढ़ियों की ओर किसी का भी ध्यान नहीं गया।सीढ़ियों पर चढ़ने की बजाय सब एक दूसरे पर गिरने लगे ।एक के ऊपर एक गिरने से किसी को संभलने का मौका ही नही मिला ।
   

जय माता दी,जय माता दी कहते हुए लोग दबे हुए लोगों की परवाह न करते हुए आगे बढ़ते गए  जो दबे पड़े थे वे जैसे ही उठने की कोशिश करते उसी समय पीछे से एक और भीड़ की टोली आ जाती।मुझे माता रानी के दर्शनों की चिंता नहीं थी, चिंता थी तो उस वृद्धा व बच्ची को बचाने की ।पता नहीं कितने छोटे-छोटे बच्चों को  माँ के भक्त  रौंदते हुए जा रहे थे।इतना होने पर भी किसी को कोई होश नहीं आया ।सब अपनी धुन में खोए हुए जा रहे थे।कुछ नौजवान  जिनमें  शायद अभी इनसानियत बची थी सहायता के लिए आगे आए और भीड़ में से नीचे दबे बच्चों व बूढ़ों को उठाने लगे ।अभी कुछ संभलते कि एक काफिला  माथे पर लाल चुन्नियाँ बाँधे,हाथ में ध्वजा -नारियल लिए हुए जय माता दी••• जय माता दी•••करते हुए रोते-बिलखते बच्चों व कराहते हुए वृद्धों को रौंदते हुए आगे बढ़ गया।सभी को माँ दुर्गा के दर्शनों की चिंता थी।इनसानियत मर चुकी थी।कितने ही बच्चों बूढ़ों को सहायता की आवश्यकता थी।सहायता करना तो दूर, कोई रुक कर देखना तक  भी नही चाहता था ।
             

चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था । जहाँ मन्दिरों में जयकारे की गूंज  व घंटा ध्वनि गूंजनी थी,वहाँ अब रोते-बिलखते बच्चों का करुण-क्रन्दन व घायलों की  चीखें मन को आहत कर रहीं थी।जयकारों की गूंज शांत होकर सिसकियों में बदल चुकी थी ।अभी भी अभिनव के एक हाथ में लाल चुनरी व दूसरे हाथ में एक घायल बच्ची का हाथ था।वह चुनरी को देखकर फफक उठा।उसे उलट-पलट कर देखता रहा ।अब  किन हाथों से वह मंदिर वाली माँ को चुनरी चढ़ाए ? मन चीत्कार कर उठा।दोनों हाथ उठाकर मृतात्माओं की शान्ति के लिए प्रार्थना करने लगा ।तभी हवा के झोंके से लाल चुनरी छूट  कर उड़ती हुई एक मृत बच्ची की देह पर जाकर गिर गई ।वहाँ से उठाकर माँ को चढ़ाने का अब उसमें साहस नहीं था ।अपनी आँखे बंद करके धम्म से घुटनों के सहारे वहीं बैठ गया ,क्योंकि अब चलकर मंदिर में जाने की शक्ति नहीं थी।उसका अन्तर्मन चीख उठा, ''माँ ये कैसी पूजा थी ? इन मासूमों का क्या दोष था ?माँ वो तेरा ही तो रूप थी , सात दिन के उपवास रखकर जो तेरा दर्शन करने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करना चाहती थी।उसे ही आपके भक्तों ने पैरों तले रौंद दिया । नहीं जानता इस पूजा - भक्ति को! ,कैसी है तेरे भक्तों की  यह भक्ति माँ ! जो जीती-जागती देवी को भोग न लगाकर मन्दिर में भोग लगाना जरूरी समझते हैं ?अनेक प्रश्न उसके मन में उथल-पुथल मचा रहे थे। बेजान हुए लोगों को देखकर वह फिर रो पड़ा •••तभी स्नेह से भरे हाथ का  स्पर्श पाकर आँखे ऊपर उठाई तो देखते ही अपनी मम्मी के गले लग कर फूट-फूटकर रोने लगा ।उनकी आँखों से भी अविरल अश्रुधारा बहने लगी ।  उन्होंने अभिनव की आँखों में जो प्रश्न थे उन्हें पढ़ लिया था•••••पर उसके किसी भी प्रश्न का जवाब नहीं था।अभिनव ने हाथ के इशारे से अपनी मम्मी को लाल चुनरी दिखा दी, जो आठ साल की कन्या के पार्थिव शरीर पर लिपटी हुई अनेक प्रश्न पूछ रही थी••••।सब निरुत्तर खड़े  थे  क्योंकि सब गूंगे -बहरे हो गये थे••••