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अचानक हृदय गति बंद होने की स्थिति में इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डेफ़ीब्रिलेटर मशीन हृदय वक्ष-स्थल में रोपित कर जान बचायी जा सकती है
February 7, 2020 • ज्ञानभद्र • राष्ट्रीय

"सडेन कार्डियक अरेस्ट (अचानक हृदय गति का बंद होना) अकाल मृत्यु के पूर्व की ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति बेहोश हो जाता है। और दो या तीन मिनट के अंदर उस व्यक्ति का इलाज न शुरू किया जाए तो उसकी अकाल मौत हो जाती है, " यह कहना है डॉ कार्तिकेय भार्गव का जोकि मेदांता हार्ट इंस्टीट्यूट में ऐसोसिएट डायरेक्टर, इलेक्ट्रो-फ़िज़ियोलॉजी एवं पेसिंग के पद पर कार्यरत हैं। प्रस्तुत हैं उनके साथ किये गये साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश : प्रस्तुति – ज्ञानभद्र

प्रश्न : सडेन कार्डियक अरेस्ट (अचानक हृदय गति का बंद होना) की वजह से अकाल मृत्यु की दर काफ़ी बढ़ गयी है। कृपया हमारे पाठकों को इससे बचने की इलाज-प्रक्रिया बताएं।

उत्तर : सडेन कार्डियक अरेस्ट, जैसा कि नाम से विदित है, इस स्थिति में अचानक दिल काम करना बंद कर देता है। दिल की धड़कन-गति काफ़ी तेज़ हो जाती है। व्यक्ति बेहोश हो जाता है। दो या तीन मिनट के अंदर उसका इलाज न शुरू किया जाए, तो उसकी अकाल मृत्यु हो जाती है।  ऐसा आवश्यक नहीं है कि हृदय रोग से पीड़ित व्यक्ति ही सडेन कार्डियक अरेस्ट की गिरफ़्त में आते हैं। वस्तुतः ऐसे व्यक्ति भी, जिनके दिल की धड़कन अनियमित, धीमी या काफ़ी तेज़ हो, सडेन कार्डियक अरेस्ट के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं।

प्रश्न : सडेन कार्डियक अरेस्ट होने की स्थिति में जल्द से जल्द क्या प्रभावी इलाज है

उत्तर : सडेन कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में, मरीज़ को जल्द से जल्द सी.पी.आर. (कार्डियो प्लमनोरी रिससीटेशन) प्रक्रिया दी जाती है। इस प्रक्रिया में, छाती के मध्य में हथेली द्वारा लगातार दस मिनट तक दबाव दिया जाता है। ऐसा लगातार करने से दिल स्ट्रनम और पिछली हड्डी के बीच दब जाता है और यह दबाव ऑक्सीजन-युक्त रक्त को मस्तिष्क की ओर प्रवाहित करने के लिए बाध्य करता है। यह प्रक्रिया करना नितांत आवश्यक है जब तक कि ऑटोमैटिक एक्सटर्नल डेफ़ीब्रिलेटर मशीन मरीज़ को उपलब्ध न हो जाए। फ़िर ऑटोमैटिक एक्सटर्नल डेफ़ीब्रिलेटर द्वारा मरीज़ के हृदय को शॉक देकर धड़कनों को नियमित किया जाता है।  ऐसा अवलोकित किया गया है कि शॉक देने से प्रायः मरीज़ की जान बचाई जा सकती है। लेकिन शॉक को जल्द से जल्द दिए जाने की आवश्यकता है।

प्रश्न : शॉक द्वारा मरीज़ की जान बचाने के पश्चात्, क्या मरीज़ को, सामान्य जीवन जीने के लिए, आगे अन्य इलाज प्रक्रियाओं से गुज़रना पड़ता है?

उत्तर : शॉक के माध्यम से मरीज़ की धड़कन को नियमित करने के पश्चात्, यह अवलोकन करना आवश्यक है कि इस सडेन कार्डियक अरेस्ट के पीछे क्या क्या कारण हो सकते हैं और मरीज़ का हृदय रोग किस प्रकार का है। भविष्य में मरीज़ को सडेन कार्डियक अरेस्ट की स्थिति से बचाने के लिए, मरीज़ के सीने के अंदर इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डेफ़ीब्रिलेटर मशीन रोपित करते हैं। इस चिकित्सा विधि में, काफ़ी कम वज़नवाले पेसमेकर का इस्तेमाल होता है। पसलियों के बीच सूराख करने के बाद पेसमेकर को छाती की बायें भाग की तरफ़ रोपित किया जाता है। दिखने में काफ़ी छोटा तथा बैटरी द्वारा चालित यह उपकरण विद्युत तरंगें उत्पन्न कर हृदय के अनियमित तथा धीमे स्पंदनों को सामान्य करता है। मरीज़ को दो-तीन दिनों तक अवलोकन कक्ष में रखकर छुट्टी दे दी जाती है। ऐसा अवलोकन किया गया है कि कुछ लोगों में हृदय की तेज़ गति धड़कनें होती हैं; लेकिन ये जानलेवा साबित नहीं होती हैं। ऐसा तेज़ गति धड़कनों का इलाज रेडियो फ़्रीक्वांसी एबलेशन विधि जोकि आजकल एक ऐडवांस 3डी-मैपिंग तकनीक के माध्यम से किया जाता है।