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भारतीय राजनीति का बदलता स्वरूप
January 9, 2020 • विजय सिंह बिष्ट • साहित्य

विजय सिंह बिष्ट 

भारत के लोगों में आजादी प्राप्ति की इतनी खुशी थी,कि इसको प्राप्त करने में  अंग्रेजी शासन द्वारा दी गई यातनाओं और अपनों की मौतों को भी भूल गए। पराधीनता के आज़ादी में बदलने का उत्सव पंद्रह अगस्त को हर्षोल्लास से मनाया गया। यह स्वतंत्रता दिवस था, जिसे आज भी बड़े उत्साह से मनाया जाता है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसको पाना कितना कठिन था। गुलामी एक कैदी की तरह जेल की चारदीवारी में रहने जैसा है। किंतु जब वह आजाद होकर बाहर आता है तब यदि वह बेगुनाह था तो अपने को आजाद समझता है ,उसको अपनी शासन सत्ता चाहिए। उद्देश्यों की पूर्ति के विधान की आवश्यकता होती है। इसलिए भारतवासियों को पूर्ण स्वतंत्रता के रूप में गणतंत्र दिवस की प्राप्ति हुई। अपना संविधान अपने राज्य के रूप में।
        विधानसभा और लोकसभा के चुनाव आरंभ हुए। वर्ष 1955/56ई0 में चुनावों का दौर आरम्भ हुआ। हमारे क्षेत्र से सर्व प्रथम राम प्रसाद नौटियाल, मेहरबान सिंह कंण्डारी कांग्रेस से विधायक हुए थे। उस समय उत्तर प्रदेश हमारा राज्य था।
 भक्त दर्शन सिंह रावत केंद्र में शिक्षा मंत्री जगमोहन सिंह नेगी खाद्य मंत्री एवं मुकंदीलाल बैरेस्टर सांसद हुआ करते थे। लोगों में कांग्रेस के प्रति अत्यधिक लगाव था। हमारे क्षेत्र में विद्युतीकरण का श्रीगणेश मेहरबान सिंह कंण्डारी द्वारा किया गया, अपने खेतों में जनरेटर लगवाकर गांव-गांव को बिजली से संयोजित किया। आज पूरे क्षेत्र में घर-घर रोशनी है।

 शिवानंद नौटियाल ने विद्यालयों का उच्चीकरण तथा राज्य करण करवाने में योगदान दिया। उनके नाम पर राजकीय महाविद्यालय वेदीखाल तथा कंण्डारी के नाम इंण्टर कालेज स्यूंसी अंकित है। हम उनके कार्यों की इन्हें धरोहर मानते हैं। भक्त दर्शन सिंह रावत और नौटियाल के प्रत्याक्षी बनने की वे चिठ्ठियां मेरे पास मौजूद हैं जो गढ़वाली भाषा में होती थी कि--हम लोक सभा और विधान सभा का वास्ता उठणा जवां, सभी गांववासियों म सेवा बोली  दियां तथा अपणू वोट हमारा पक्ष म दिलाई देला। सारे गांव के लोगों में बैठक कर पत्र  सुनाया जाता, और निर्धारित दिन पर गाजे वाजों सहित  सारे गांव के नर नारी जलूस लेकर नारे लगाते पोलिंग स्टेशन में जाते।
  प्रत्याक्षी कांग्रेस,जनसंघ और निर्दलीय हुआ करते थे।
      नारे  नैनसिंह का तूल है।
      पद्मादत का फूल है
इनको वोट देना वोटरों की भूल है।

बैलों की जोड़ी,गाय और बछड़ा, फिर हाथ कांग्रेस निशान बदले गए, साथ ही साथ नये नये लोग अपनी छवि लेकर आगे आए। हमारे उत्तराखंड ने उत्तर प्रदेश को गोविन्द वल्लभ पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा मुख्यमंत्री भी दिये हैं। उस समय के लोगों में भले ही शिक्षा का अभाव था लेकिन एकता का अभाव नहीं था। नेतृत्व अच्छे शिक्षित और मान्यता प्राप्त लोगों के हाथों में था।अल्पवेतन, भत्तों और आज की तरह पेंशन नहीं थी। भ्रष्टाचार भी इतना नहीं था।लोग मर्यादा में रहकर काम करते थे। उत्तर प्रदेश सरकार में रहकर इतने विकास के कार्य चाहे नहीं हुए। किंतु इन लोगों के नेतृत्व में कोई ग़लत काम भी नहीं हुए।इसीलिए आज भी लोग उनके नाम श्रद्धा से लेते हैं। विद्यालयों महाविद्यालयों को उनके नाम से अंकित किया गया है। सरकारें आती और जाती रहेगी, लेकिन काल के गर्भ से और भविष्य में लोगों के दिलों के सम्राट बनना अपने आप में इतिहास बनाना जैसा है। आशा करते हैं वर्तमान और भविष्य के कर्णधार भी अपनी छवि छोड़ कर देश निर्माण में योगदान देंगे।