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ढ़ाई आखर प्रेम का
February 14, 2020 • सुरेखा शर्मा  • साहित्य

शर्मा ,स्वतंत्र लेखन /समीक्षक

प्रेम के कई रूप हैं। प्रेम शब्द ढाई आखर का होते हुए भी अपने अंदर विशालता समेटे हुए है । यह एक ऐसा भाव है,जो स्वतः ही प्रस्फुटित होता है। इसे करना जितना मुश्किल है उतना ही मुश्किल है इस पर कुछ कहना व लिखना।प्रेम जीवन को सुखद और जीने योग्य बनाता है। हर काल,हर भाषा और हर समाज का साहित्य  इस अद्भुत भाव से भरा पड़ा है । प्रेम के विभिन्न रूप हैं। प्रेम प्रकृति की देन है।प्रेम को किसी सीमा या सिद्धांत में नहीं बांधा जा सकता । प्रेम शाश्वत भाव है जिसको पाने के लिए विचारों में प्रेम- भाव मुख्य हैं। इसमें पवित्रता और सत्यता जरूरी है । जहां प्रेम होता है वहां का परिवेश सकारात्मक ऊर्जा लिए हुए होता है। अतः हम यहां जिस प्रेम की बात कर रहे है वह है - फरवरी मास में चहूं ओर प्रेम की सुवास से  सुगंधित करने वाला ,सराबोर करने वाला प्रेम अर्थात् 'ऋतुराज बसंत' यानि प्रेम का महीना ।

देखा जाए तो हमारा भारत देश ऋतुओं व त्योहारों का देश कहलाता है ।इसमें कोई अतिशयोक्ति भी नही है ।   हर मास कोई न कोई पर्व आता रहता है।मन में जब भावनाओं की कोपलें फूटने लगे तो समझो वसंत आ गया।इसी क्रम में वसंत ऋतु का विशेष पर्व वसंत पंचमी भी  आता है। ऋतुराज वसंत जब आता है तो प्रकृति भी अपने यौवन पर होती है। प्राचीन काल से ही वसंत ऋतु को "वसंतोत्सव" के रूप में  पूरे उत्साह से मनाने की परंपरा रही है।शीतल, सुखद वासंती समीर जब तन-मन को स्फुरित करने लगे ,खेतों में पीली सरसों लहराने लगे, फूलों पर मधुरस पान करने के लिए मधुकर मंडराने लगे तो समझो मधुऋतु अर्थात् कामदेव की ऋतु  का आगमन हो चुका है ।संस्कृत ग्रंथों में बसंत को कामदेव की मधुऋतु कहा गया है। सच भी है वसंत ऋतु है ही उल्लास,उमंग  और मस्ती  की ऋतु ।

पर आज बसंत उत्सव का रूप बदल गया है ।पश्चिमी देशों की तर्ज पर इसके रूप को प्रेम उत्सव,प्रेम -दिवस अर्थात्  'वेलेंटाइन डे ' ने ले ली है। समय के साथ-साथ इश्क, प्रेम इजहार करने के अंदाज ही बदल गए हैं  । प्रेम आज ऑनलाइन हो गया है ।प्रेम अब छिपाने की नही बल्कि दिखाने की चीज बन गई है ।    देखा जाए तो इसमें कोई बुराई भी नहीं है। प्रेम एक गहरी संवेदना है।इसी संवेदना की मूल भावना प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए 'वेलेंटाइन डे' को अपनाया गया है ।14 फरवरी को मनाए जाने वाले इस 'वेलेंटाइन डे' का  इंतजार छोटे शहरों से लेकर  बड़े शहरों तक के युवाओं को रहता है। धड़कते युवा दिल अपने साथी से अपने प्रेम का इजहार करने के लिए इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं।आज इसका नशा प्रायः हर युवा पर छाया हुआ है ।
               'सेंट वेलेन्टाइन डे' का विरोध हर वर्ष  भारत में बहुत जोर-शोर से  किया जाता है, क्या इसलिए कि यह 'प्रेम दिवस' है ? जो कि अनुचित है।प्रेम के स्वरूप की अभिव्यक्ति जो भारतवर्ष में है वह विश्व के किसी भी कोने में नहीं है।हमारे धर्मशास्त्रों में जो पुरुषार्थ -चतुष्ट्य बताया गया है -धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष ।उनमें काम स्वयंसिद्ध है ।काम ही सृष्टि का मूल है।बसंत का यह प्रेेेम सिर्फ इनसानों पर ही नहीं बल्कि संंपूर्ण प्रकृति पर बरसता है । प्रेेेम से परिपूर्ण  व्यक्ति ही समाज को प्रेम दे सकता है ।
                  सृष्टि के प्रारंभ से ही प्रेम का अंकुर प्रस्फुटित हुआ है ।जिसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती ।यह एक ऐसा स्रोत है जो जीवन के प्रति आकर्षण उत्पन्न करता है।निराशा में  आशा का संचार करता है ।संस्कृति के संदर्भ में 'काम' को देखें तो स्त्री - पुरुष संयोग तक उसकी वास्तविकता को समेटकर आज केवल 'कामुकता' का पर्याय बना दिया है ।यदि देखा जाए  'काम' यदि मन का विकार होता तो अपने तेज से जलाकर  राख कर देने पर शिव अनंग रूप में पुनः जीवित  क्यों करते ? प्राचीन आचार्यों ने काम-विज्ञान  पर अनेक ग्रंथ लिखे।'काम' के आधार पर जगत का निर्माण और उसका विकास निर्धारित है।कृष्ण ने गीता में कहा  है 'ऋतुना: कुसुमाकर' अर्थात् ऋतुओं में मैं बसंत हूं। इसमें कोई अतिशयोक्ति नही ।

महर्षि वात्स्यायन जैसे ही संत वेलेन्टाइन जो इटली में पैदा हुए  थे।कहा जाता है कि रोमन सम्राट  क्लाॅडियस द्वितीय और वेलेंटाइन के बीच तलवारें खिंच गई थी । क्लाॅडियस द्वारा  विवाह पर रोक लगा दी गयी थी ।उसे कुंआरे नौजवान फौजियों की जरूरत थी।सम्राट के चंगुल से निकल कर भागने वाले युवक व युवतियां जिस ईसाई संत की शरण में जाते थे, वे थे संत वेलेन्टाइन ।वेलेंटाइन उनके विवाह करवा देते थे और प्रेम करने की शिक्षा देते थे साथ ही साथ जो सम्राट की कैद में होते थे उन्हें गुप्त रूप से छुड़ाने की कोशिश करते थे। कहते है इसी कारण  प्रेम के पुजारी संत को सम्राट ने मौत के घाट उतार दिया ।
      किंवदन्ति यह भी है कि मौत से पहले वेलेन्टाइन ने प्रेम की गहराई में डुबकी लगाई ।वे सम्राट  क्लाॅडियस की जेल  में रहे और जेल से ही जेलर की बेटी को अपना प्रेम संदेशा  कार्ड के माध्यम से  पंहुचाया जिसके अंत में लिखा था -'तुम्हारे वेलेंटाइन की ओर से।'  यह वही पंक्ति है जो आज भी यूरोप के प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे को लिखना पसंद करते हैं।
                 फरवरी के मध्य तक प्रकृति के साथ- साथ प्राणी जगत में ,चराचर जगत में परिवर्तन देखने को मिलता है ।तभी कहा जाता है 'आया बंसत,पाला (जाड़ा ) उडंत।'बसंत ऋतु में आए बदलाव का वर्णन कालिदास ने 'ऋतुसंहार' में,श्री हर्ष ने 'रत्नावली ' में,भास ने स्वप्नवासदत्तम में और विशाखदत्त ने 'मुद्राराक्षस' में वर्णन किया है । सौन्दर्य का,प्रेम का,श्रृंगार का, रति का, ऋतुओं का वर्णन किसी पश्चिमी कवि या नाटककार ने नही किया होगा ।यदि प्रेम के पुजारी संत वेलेन्टाइन का विरोध करेंगे तो कालिदास ,हर्ष,बाणभट्ट का  क्या करेंगे? खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों का क्या होगा ? जिस प्रेम के स्वरूप का चित्रण भारतीय संस्कृति में है उतना वेलेंटाइन प्रेमियों को कहीं मिल जाएगा? आज का युवा अंधेरे में राह खोज रहा है।जहां मीरा और राधा का प्रेम हो वहां अगर वेलेंटाइन डे की प्रतीक्षा करें तो उन्हें क्या कहा जाएगा?  बगीचे में बैठा व्यक्ति कागज के फूल सूंघता है तो उसे क्या कहेंगे ? 

कुछ समय से वेलेंटाइन डे पर फिजूलखर्ची का नया रूप ही देखने को मिल रहा है । युवा वर्ग को वेलेंटाइन डे अपनी ओर आकर्षित करता है।प्रेम का इजहार करने के लिए मंहगे से मंहगे कार्ड,गिफ्ट आकर्षक पैकिंग में देना एक स्टेटस सिंबल बन गया है । मल्टीनेशनल कंपनियों का मकड़जाल इतना फैल चुका है कि सबसे ज्यादा युवा वर्ग ही इसमें फंस रहा है।खून-पसीने की कमाई अमीर देशों को चली जाती है।बाजारू संस्कृति के कारण ही प्रेम का उत्साह प्रेमी-प्रेमिका तक ही सीमित रह गया है ।युवाओं को आकर्षित करने के लिए एक महीने पूर्व ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है ।ग्रीटिंग कार्ड, आकर्षक गिफ्ट, चाकलेट, गुलाब का फूल, संदेश पत्र,मोबाइल पर प्यार भरे मैसेज दिखाई देने के साथ-साथ होटल और क्लब अपनी और खींचने के लिए नये-नये विज्ञापन निकालते हैं।कुछ होटल तो सर्वश्रेष्ठ वेलेंटाइन जोड़े का चयन कर आकर्षक गिफ्ट देते हैं।वैसे गुलाब की महक ना हो तो वेलेंटाइन डे अधूरा -सा लगता है।इस दिन गुलाब की कीमत दस गुना बढ़ जाती है, मांग अधिक होने के कारण प्रेमियों को गुलाब के बिना ही अपना प्रेम दिवस मनाना पड़ता है ।
            वैसे देखा जाए तो वेलेंटाइन डे को जोर-शोर से मनाने व जेब से ज्यादा खर्च करने के बाद भी क्या प्रेमी समझ सके हैं कि यथार्थ में प्रेम है क्या ?गिफ्ट, मंहगे कार्ड,मंहगे होटल्स में जाकर नृत्य करना ही क्या प्रेम है ? प्रेम को शब्दों में बांधना अत्यंत कठिन है ।प्रेम एक अनुभूति है।जिसे हर व्यक्ति अनुभव कर सकता है। वेलेंटाइन डे का इंतजार करते एक युवा   से पूछा गया तो उसका उत्तर था, प्रेम का  इजहार करने के लिए किसी खास अवसर की इन्तजार नही होती ।
        आज वेलेंटाइन डे की आड़ में कुछ युवा अशोभनीय व्यवहार व गलत हरकते करते हैं।प्रेम जोर जबरदस्ती की चीज नही जिसे करने के लिए कहा जाए बल्कि दिल से दिल की राह होती है।प्रेम ह्रदय की धड़कन है।हृदय से स्वयं ही प्रस्फुटित होती है और बिना कहे अपने मीत तक पहुंच जाती है।तभी तो कहा गया है कि दिल को दिल से राह होती है।यदि यह कहा जाए कि वेलेंटाइन डे एक बहुत ही सुंदर अवसर है अपने मन की अनुभूति को अभिव्यक्त करने का । लेकिन बिना आडंबर के, बिना दिखावे के।प्रेम करने के लिए अधिक खर्च व तामझाम की जरूरत नही।भारती युवाओं ने इसे अपना लिया है तो सहजता से स्वीकार कर दंगे व विरोधाभास नही होना चाहिए ।अपने प्यार को, मन की भावनाओं को प्रकट करने का  दिन है ।लेकिन आज की युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति व आदर्शों को भुलाकर व्यवहारिकता पर विश्वास करती है।उनके विचार में पैसे होगा तो प्यार अपने आप चलकर आएगा ।पैसे पास में होंगें तो सब मित्र बन जाएंगे ।आज की पीढ़ी प्रेमाभिव्यक्ति को पैसे से तोल रही है ।उनके विचार से वेलेंटाइन डे मनाने के लिए जेब भरी होनी चाहिए ।पश्चिमी जीवन शैली को अपनाने के चक्कर में अपनी सभ्यता की बातों को दरकिनार कर रहे हैं ।
                  वेलेन्टाइन डे मनाने के नाम पर जिन माध्यमों का उपयोग किया जा रहा है उसमें वास्तविक प्रेम के स्वरूप की झलक रत्ती भर भी नहीं मिलती।हां इतना अवश्य है कि प्रेम की राह में चलते हुए युवक युवतियों को धोखा मिलने का खतरा हमेशा रहता है।आज जरूरत है प्रेम जैसी  सुन्दर भावनाओं का मजाक ना बनाया जाए। प्रेम एक अनुभूति है जो एक-दूसरे को जोड़ती है।प्रेम मन की प्रबल इच्छा है, शक्ति है।हृदय से कमजोर व्यक्ति प्रेम कर ही नहीं सकता।वेलेन्टाइन डे की आस लगाए हजारों नवयुवक यह क्यों भूल जाते हैं कि वेलेन्टाइन ने रोम के युवकों को न तो कोई व्यभिचार, अनाचार या अनैतिकता सिखाई न ही दुश्चरित्रता का पाठ पढ़ाया वह तो डूबते हुए  लोगों का सहारा बना।जैसे हमारे समाज के प्रेमी जोड़े जो बागी हो जाते थे तो आर्य समाज उनका सहारा बनता है ,वैसे ही रोम के प्रेमी-प्रेमिकाओं का शुभ चिंतक वेलेन्टाइन था।अब अगर विदेशी मल्टीनेशनल कम्पनियां वेलेन्टाइन के नाम पर जाल फैला रही हैं तो उसमें वेलेन्टाइन का क्या दोष ? अतः वेलेन्टाइन को न नायक बनाया जाए न खलनायक । वेलेन्टाइन का विरोध करने वाले वेलेन्टाइन की आड़ में अपना उल्लू सीधा करते हैं ।जिस भारत में प्रेम ग्रंथ लिखे गए उन्हें वेलेन्टाइन से क्या डर? जिस देश  में कृष्ण और राधा और मीरा के प्रेम का गान होता हो वहां  वेलेन्टाइन का प्रेम नही टिक सकता। दुनियाभर के  हर काल मेें ,हर भाषाा का साहित्य अद्भुत प्रेम  कथाओ से भरा पड़ा है । 
           तो आज प्रेम की अभिव्यक्ति के तरीके इतने विकृत व दूषित क्यों हो गए हैं ?  हर वर्ष वेलेंटाइन के नाम पर विरोध और दंगे करवाए जाते हैं इन्हें रोकना होगा।आम जनता को वेलेन्टाइन से कोई सरोकार नहीं। झंडा उठाकर वेलेंटाइन डे के विरोधियों से यदि पूछा जाए कि नारी जाति को,समाज  को कितनी सुरक्षा प्रदान करते हैं तो बगले झांकते नजर आएंगे ।जब छोटी -छोटी लड़कियों के साथ दुराचार होता है ,तब कहीं ये या इनके दल विरोधी अभियान के झंडे लिए हुए नारे लगाते हुए दिखाई देते हैं  ? नही न । 
तो आइए ! बिना शोर शराबा किए ,बिना दिखावे के इस दिन को इस ऋतु को सुंदर व सुखद सब प्रेमोत्सव ,बसंतोत्सव ,प्रेम दिवस मनाने का प्रयास करें।समाज में प्रेम के बीज बोएं न कि नफरत के , कटुता के ईर्ष्या-द्वेष के ।तभी प्रेम दिवस मनेगा। "प्रेम न बाड़ी उपजे ,प्रेम न हाट बिकाई•••••"