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गांधी जी का भारतीय साहित्य पर प्रभाव "
March 17, 2020 • सुरेखा शर्मा (लेखिका /समीक्षक) • साहित्य

सुरेखा शर्मा  (लेखिका/समीक्षक)

जब भी गांधी जी का नाम लिया जाता है तो सोहन लाल द्विवेदी जी की ये पंक्तियाँ स्वतः ही स्मरण हो आती हैं-----
आँसू बिखराते बीतेंगी जलती जीवन की घड़ियां
बिना चढ़ाए शीश, नहीं टूटेंगी माँ की कड़ियाँ। आइंस्टाइन ने गांधी जी के लिए कहा था---- आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही विश्वास करेंगी कि इस तरह का हाड-माँस का कोई  व्यक्ति  इस धरती पर चला था।वास्तव में  ही साबरमती के संत ने वो कर दिखाया जिसे आज सम्पूर्ण विश्व नमन करता है। "एकाएक चल पड़ा आत्मा का पिंजर,मूर्ति की ठठरी।

 नाक पर चश्मा, हाथ में डंडा, कंधे पर बोरा ,हाथ में बच्चा ।''आजादी की लड़ाई लड़ने के लिए । आजादी कोई वस्तु नहीं है जो उपहार में मिल जाए।उसे हासिल करना पड़ता है ,और हासिल करने के लिए लड़ना पड़ता है। ब्रिटिश शासन से भारत को आजादी भी एक लंबी लड़ाई के बाद मिली थी ।इसकी शुरुआत हुई थी गाँधी जी के चंपारण  आन्दोलन से,जिसके अब सौ वर्ष पूरे हो चुके हैं।आज यह कल्पना करना मुश्किल है कि चंपारण की लड़ाई कैसी थी।यह अहिंसक आन्दोलन था। अब तक का एक ऐसा आन्दोलन जिनमें न जलूस निकले,न लाठी चार्ज न गोली बारी हुई, न ही कोई हताहत हुआ । ब्रिटिश सरकार ने गांधी जी  को वह इलाका छोड़ने का हुक्म सुना दिया पर गांधी जी ने कहा ,कि चाहे जो सजा दी जाए वह मंजूर होगी पर चंपारण को छोड़कर चले जाना असंभव है।  महात्मा गांधी के नेतृत्व में चला यह आंदोलन केवल राजनीतिक सत्ता  के परिवर्तन का आंदोलन नही था।वह भारतीय सभ्यता की पुनर्स्थापना  का आंदोलन था।महात्मा गांधी के इस मंतव्य को  भारतीय समाज ने तो सहज ही ग्रहण कर लिया  लेकिन अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग आज भी ग्रहण नहीं कर पाए।इसी कारण सन् 1947 में सत्ता परिवर्तन हुआ, लेकिन अंग्रेजों का खड़ा किया गया तंत्र ज्यों का त्यों बना रहा ।जो आज भी साधारण भारतीयों के पुरुषार्थ की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है ।आज ब्रिटिश शासन की विदाई के सात दशक बीत चुके हैं फिर भी हम उसी यूरोपीय सभ्यता का अनुकरण करने में लगे हैं,जिसके विरूद्घ हमने यह विलक्षण आंदोलन आरंभ किया था।
                                 

आजादी की लड़ाई के दौरान गांधी जी ने मानव अधिकारों के लिए बहुत लंबी लड़ाई लड़ी,लेकिन अधिकारों के साथ उन्हें अपने कर्तव्यों का बोध भी था ।गांधी जी के जीवन का मूल उद्देश्य भारत को अंग्रेजी दासता  से मुक्ति दिलाना था और मुक्ति दिला भी दी थी।लेकिन  हमें आजाद भारत देकर स्वयं दुनिया से चले गए। गांधी जी के विचारों और सत्याग्रह आंदोलन का प्रभाव संपूर्ण देश पर पड़ा । यहां तक कि साहित्य जगत पर भी पड़ा ।किसी भी भाषा का साहित्यकार हो गांधी जी के विचारों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा ।गुजराती भाषा के कवियों ने तो गांधी जी के सिद्धांतों को काव्य का रूप बनाकर उन्हें अपने जीवन में भी स्थान दिया ।हिन्दी के राष्ट्रीय सांस्कृतिक कवियों ने  गांधी जी के विभिन्न  आंदोलनों और सत्याग्रह  अभियानों को विषय बनाकर  तत्कालीन कवियों ने नव जागरण का शंख बजा दिया था ।अंग्रेजों के शासनकाल मे भारतीय जनता पर जो अत्याचार हो रहे थे उसके विरोध में कवियों की लेखनी  से ओजपूर्ण कविताएं लिखी गई ।जिनमें गुलामी व दासता की भर्त्सना मिलती है। कवि बालकृष्ण शर्मा नवीन ने तुंग शिखर पर स्थित मातृ मन्दिर की ओर निर्भय होकर आगे बढने तथा अपने कंठों की  माला अर्पित करने का आह्वान किया ।कवि माखनलाल चतुर्वेदी ने मातृभूमि पर शीश चढ़ाने को आह्वान किया तो दिनकर अपनी ओजपूर्ण वाणी में बलिदान का संदेश देते रहे।
             

गांधी जी ने जर्जर रूढ़ीवाद का खंडन किया और समता तथा  बंधुत्व के आदर्श का प्रचार प्रसार जन-जन में किया ।गुलामी की जंजीरों से मुक्त करने का आह्वान भी गांधी जी की ऐसी प्रेरणा थी  जिसने अनेक  कवियों को  अपनी -अपनी ओजस्वी वाणी द्वारा क्रांति  की ओर उन्मुख किया। स्वदेश और स्वदेशी के प्रति प्रेम और धार्मिक कट्टरता का विरोध गांधी जी का मूलमंत्र था ।स्वतंत्रता आंदोलन मे भाग लेने की भावना और हिंसा का विरोध  एक ऐसा सत्याग्रह  था  जिसकी और देश के बुद्धिजीवी  ही नही अन्य देशों के बुद्धिजीवियों का भी  ध्यान इस ओर गया । गांधी  जी का उद्देश्य उन व्यवस्थाओं को उखाड़ फेंकना था,जो पराधीनता के दौर में  लाद दी गई थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि  गांधी जी के सत्प्रयासों के कारण ही शताब्दियों से सोया हुआ भारत जाग उठा था।आज भी चंपारण और बारडोली सत्याग्रह, साइमन कमीशन का विरोध  नमक सत्याग्रह आन्दोलन स्मृति पटल पर अंकित हैं । ये ऐसे सक्रिय कार्यक्रम थे कि उन्होंने देश में एक नई राजनीतिक चेतना उत्पन्न कर दी थी। गांधी जी के जीवन में विचार और कर्म की ऐसी  समानता थी कि उसने देश के प्रत्येक कृतिकार व रचनाकार को प्रभावित किया, चाहे व किसी भी भाषा का साहित्यकार हो।गुजरात जो बापू की जन्मभूमि तो था ही साथ ही कर्मभूमि होने का भी गौरव प्राप्त करता है। इसलिए गांधी जी गुजराती कवियों रचनाकारों के लिए रचनात्मक भूमिका निभाते रहे।गांधी जी ने अपनी रचनाधर्मिता का बखूबी निर्वहन किया। वे अपनी रचनाओं में व विशेष रूप से अपनी आत्मकथा के द्वारा गुजराती भाषा को अनुभूति  और अभिव्यक्ति की नई पहचान दी। उनके व्यक्तित्व की तेजस्विता विचार और कार्य के समरूप ने उनके गद्य को रचनात्मकता की  असाधारण ऊंचाई तक पहुंचा दिया । गांधी जी के विचारों का गुजराती भाषा के लेखकों पर गहरा प्रभाव पड़ा ।
                       

गुजरात के समीपवर्ती महाराष्ट्र में राष्ट्रीय चेतना का एक और रूप हमें मिलता है।वीर सावरकर रचित तमाम काव्य स्वतंत्रता संग्राम में दी गई  आत्माहूति से उत्पन्न हुआ है जिसकी ज्वाला ने समूचे राष्ट्र की चेतना  को प्रदीप्त  कर दिया था और ऊर्जावान कर दिया था  ।सावरकर स्वयं ही एक सशस्त्र क्रांति के  उद्घोषक थे जिन्होंने कई वर्षों कालेपानी की सजा पाकर अंडमान की जेल में कठिन से कठिन दुख सहे थे।उनकी कविताओं से प्रेरणा लेकर ऐसी क्रांतिकारी कविताओं की बाढ आ गई ।जिनमें है माधव ज्यूलियन की कविताएं जो देश पर तन -मन -धन न्यौछावर करने की प्रेरणा देती थी। देखा जाए तो 'क्रांति ' शब्द  में है ही कुछ ऐसा चाहे इसका रूप हिंसक हो या अहिंसक। क्रांति शब्द सुनकर स्वतः ही जोश भर जाता है। कवि कुसुमाग्रज ने क्रांति की  भावना को संवेदनात्मक अनुभूति की चरम स्थिति तक पहुंचाने में अभूतपूर्व सफलता पाई है । उनकी कविता की पंक्तियाँ देखिए --                                                                             "गर्जा जय-जयकार क्रांतिया गर्जा  जय -जयकार,
                            अन् वज्रांचे छातीवरती ध्या झेलूनी प्रहार ।"
अर्थात् हे आजादी के दिवानो ,तुम क्रांति की प्रचंड गर्जना करो,अपनी छातियों पर वज्रों के कठोर प्रहार झेलो। इस प्रकार यशवंत दिनकर पेंढरकर की राष्ट्रीय  संवेदना से परिपूर्ण कविताओं में मर्म को  छूने की  अद्भुत सामर्थ्य है।  कवि कुमार आशान ने जाति-पाति और छुआछूत के विरुद्ध कविताएं लिखी । कुमार आशान ने गांधी जी की छुआछूत  विरोधी भावना को अपनी कविता में साकार किया।"मातृभूमि के चरणों में"  और "माँ" उनकी गद्यकृतियां है।आजादी के पूर्व का साहित्य चाहे वह दक्षिण का हो या उत्तर -पूर्व का ,स्वतंत्रता संग्राम और गांधी जी के संदेश की प्रतिध्वनि बन गया था ।"जाग ओ युवा रक्त  जाग", 'जीवन का उद्देश्य', ," हे जन्मभूमि"  जैसी कविताएं भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन  की उपज हैं।रोमानी धारा की प्रमुख कवयित्री  नलिनी बाला मूलतः राष्ट्रवादी थीं ।उनकी कविता  "मुक्ति " में स्वतंत्रता  संग्राम के जयघोष  की मार्मिकता लिए हुए है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय  ने अपने उपन्यास 'आनंद मठ' में  "वन्देमातरम्" जैसी अमर गीत कृति लिखी। जो हमारा राष्ट्रीय गीत बन गया ।कलकत्ता में 1896 में भारतीय  राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर  ने इसको गाया।1905 में बंग-भंग के  विरोध में ऐसा आन्दोलन शुरू हुआ   कि  ब्रिटिश शासन दहल उठा । रविन्द्र नाथ टैगोर ने भारत में व्याप्त गरीबी के लिए ब्रिटिश प्रशासन को ही दोषी ठहराया था।
               

उड़िया साहित्य पर भी सन् 1921 के  असहयोग आन्दोलन का बखूबी प्रभाव पड़ा । गोपबंधुदास उड़ीसा में अपनी कविताओं द्वारा राष्ट्र जागरण का बिगुल बजा रहे थे ।गांधी जी के असहयोग आन्दोलन और नमक सत्याग्रह ने उड़ीसा के युवा कवियों में जोश भर दिया था ।'स्वाधीनता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है " को मूलमंत्र मानकर कुंतला कुमारी, लक्ष्मी कांत,पद्म चरण, कृष्ण चंद्र आदि कवियों ने राष्ट्र भक्ति की कविताओं का सृजन किया। इकबाल  और जोश मलीहाबादी ने गुलामी को मिटा देने के लिए देशवासियों का आह्वान किया ।सन् 1905 में "सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" नामक प्रसिद्ध गीत लिखा।वतन के कण-कण को खुदा माना। हिन्दी कवियों में मुख्यतः सियाराम शरण गुप्त,माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारीचौहान,दिनकर, सोहन लाल द्विवेदी आदि कवि गांधीवादी थे।इन सबके लिए  "वसुधैव कुटुम्बकम्" का आदर्श मान्य था । इस प्रकार राष्ट्रीय चेतना जगाने में गांधी जी और उनके असहयोग आन्दोलन का मुख्य प्रभाव रहा है।
           आज गांधी जी की विचारधारा का महत्त्व अपने देश में ही नही दुनियाभर में तमाम विचारक पहले से कहीं अधिक मान रहे हैं। जिसका कारण यही है कि उनके विचारों में संपूर्ण परिवर्तनवादी दृष्टिकोण मौजूद था।उन्होंने व्यष्टि और समष्टि,दोनों का पूरा परिप्रेक्ष्य जोड़कर समाज के सामने रखा।उनकी विचारधारा एकांगी नही थी।गांधी जी जो सामाजिक मुद्दों पर जोर दे रहे,उसमें अहिंसा के साथ-साथ  सादगी और  स्वावलंबन का विचार  बहुत महत्त्व रखता था।