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गीत देश का गाते आये गीत देश का गाएंगे 
August 26, 2020 • सुषमा भंडारी • साहित्य

सुषमा भंडारी

 गीत देश का गाते आये गीत देश का गाएंगे 
जीयेंगे धरती की खातिर धरती पर मिट जाएंगे
वंदे मातरम मातरम् 
जान से प्यारा हमें तिरंगा उंचा ही लहरायेगा
वन्देमातरम का ये नारा अधरों पर मुस्काएगा
शीश कटे तो कट जाए पर झन्डा न झुक पायेगा
वंदे -------
तिलक लगाकर इस माटी का आगे बढते जायेंगे
दुश्मन हों या घर के भेदी सब से लड़ते जायेंगे
विश्व गुरु है भारत अपना सबको ये बतलायेंगे
वंदे-------
गाँधी सुभाष और भगत सिंह ने आजादी दिलवाई है
सुखदेव, आजाद झूल गए तब ये धरोहर पाई है
जाति- धर्म का भेद नहीं ये धरती सब की माई है
वंदे --------
दुश्मन की ललकार सदा ही आगे बढ़कर सुनते हैं 
हिन्दुस्तान हमारा है जो आँख उठाए धुनते है
स्वप्न सदा ही प्रेम - भाव के हम तो नितदिन बुनते हैं
वंदे मातरम् 
वंदे मातरम वंदे मातरम, वंदे मातरम वंदे मातरम....

 सब अकेले हो गये 

गीत अपने गाँव के मैं 
गाउँगी क्या अब भला
आम-पीपल और बरगद
सब अकेले हो गये

धूप की अठखेलियाँ बस
सूनी राहें देखती 
धुंधली नजरें , वृद्ध लाठी 
सब अकेले हो गये

पंछियों की बोलियाँ भी
लाये न मेहमान को
जा बसे हैं अब नगर में 
सब अकेले हो गये

भोर की किरणें सुहानी 
कोना- कोना ढूंढ़ती
लौट जाती फिर अकेले 
सब अकेले हो गये

रेत नदियाँ भी वहीं है
बस घरौन्दे ही नहीं
नन्हे हाथों की छुअन बिन
सब अकेले हो गये

गीत हैं खामोश सारे 
ये मुखर होते नहीं
नजरें ड्योढ़ी पर रुकी हैं 
सब अकेले हो गये 

पनघटों की साँझ सूनी
सुबह भी खामोश है
अब कहां पैरों की रुनझुन 
सब अकेले हो गये।

मानवता ही धर्म है , ये जीवन का राग
भेदभाव की नींद से जाग मुसाफिर जाग।।

मानवता ही धर्म है , ये ही सच्ची राह
चल नेकी की राह पर, कर न तू परवाह ।।

मानवता ही धर्म है , इस पर करो विचार
सब ईश्वर का अंश हैं , सभी एक परिवार ।।

मानवता ही धर्म है , मानवता अनमोल
झगड़े और फसाद का, बंद करो अब ढोल। ।

मानवता ही धर्म है , जन- जन को समझायें
ये सबसे अनमोल है , इसको ही अपनायें ।।

मानवता ही धर्म है , कर्मठता है मीत
दोनों जिसके पास होँ, जाने सच्ची प्रीत ।।

मानवता ही धर्म है , यही है सच्चा ज्ञान
जो ज्ञानी इस राह का, भूले न मुस्कान ।।

मानवता ही धर्म है , हरदम रखें साथ
मानवता जो सीख ले, सुखमय हो प्रभात ।।

मानवता ही धर्म है , इस से बड़ा न कोय
रहता इससे दूर जो , जीवन में वो रोय ।।

मानवता ही धर्म है , इससे रिश्ता जोड़ 
जो राहें विपरित हों, उन राहों को छोड़।।।

 निर्झरिणी 

निर्झरिणी मैं बहती रहती
नियति मेरी बहने की
कुदरत ने ही दी है शक्ति 
मुझको सब कुछ सहने की
निर्झरिणी मैं ---------

बेशक रोज थपेड़े झेलूं
मुश्किल आगे बढ़कर ले लूं
अपने जब जब ठोकर मारें
खेल समझ कर उनसे खेलूं
त्याग, तपस्या, प्रेम - भावना
कहूं क्या अपने गहने की
निर्झरिणी मैं बहती रह्ती
नियति मेरी बहने की...........

सबकी पीड़ा को हर लेती
सबको अपना मैं कर लेती
मेरा रिश्ता तूफानों से
मरना हो तो मैं मर लेती
सब जाने स्त्री की शक्ति 
बात नहीं ये कहने की
निर्झरिणी मैं बह्ती रह्ती
नियति मेरी बहने की..........

पाया दुखों को बचपन से
रिश्ता गैर रहाआँगन से
जाना होगा इक दिन घर से
झूठा नाता है दामन से
कहने को तो दो घर मेरे
बात मगर है रहने की
निर्झरिणी मैं बहती रह्ती
नियति मेरी बहने की........

घर- बाहर दोनों को स्ंभालूं
ख्वाब आस्था के ही पालूं
पत्थरों को रोज तराशूं
मूरत में मैं उनको ढालूं 
यूँ तो हूँ स्वभाविक शीतल 
पर कमी नहीं मेरे दहने की
निर्झरिणी मैं बहती रह्ती
नियति मेरी बहने की----------
सुषमा भंडारी