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जिन्दगी तृप्ति है न प्यास है
April 23, 2020 • विजय सिंह बिष्ट • साहित्य

विजय सिंह बिष्ट

जीवन दर्शन।
जान है तो जहान है।
जिंदगी दूर है न पास है।
जिन्दगी तृप्ति है न प्यास है।
मृत्यु तो सदा नवीन,साहस पास है।
जिन्दगी दूर है न पास है।
कोरोना दूर है न पास है

चित्र बन रहा लकीर मिट रही।
अज्ञात शत्रु हार रहा,आयु घट गई।
राह में भटक रहा पथिक,
आंखों में अश्रु हैं न हास है।
कोराना भयानक शत्रु है
जान है तो जहान है

जी रहा स्नेह, मृत्यु जी रही।
पग पग पर दृढ़ विश्वास है।
हार जायेगा अदृश्य शत्रु भी,
विजय मंत्र हमारे पास है।
जान है तो जहान है।

कोरोना दूर है न पास है।
कर रहा मनुज अनेक यत्न,
रक्षा सूत्र सभी हमारे पास हैं।
अनंत की तरह अनंत भाव हैं।
 अपूर्णता पूर्णता भरी,साहस प्रर्याप्त है।
जिन्दगी दूर है न पास है
कोरोना भगाइए,वह दूर है न पास है।
 मोह जाल त्याग दीजिए,
यही जाल तो कमाल है।
दूरियां एक दिन मिट जाइगीं,
दृढ साहस कीजिए,दिलाइए।
यही कोरोना से जीत का विश्वास है।