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ओ जट्टा आई बैसाखी --बैसाखी का दिन सूर्य पर्व का प्रथम दिन माना जाता है
April 12, 2020 • सुरेखा शर्मा • राष्ट्रीय

सुरेखा शर्मा,लेखिका /समीक्षक

समूचे उत्तर भारत में जनजीवन को यदि कोई दिन सबसे अधिक उमंग और उल्लास से भर देता है तो वह है, बैसाखी का दिन । लेकिन इस बार पूरी दुनिया को एक ऐसी महामारी ने अपने मकड़जाल में ग्रस लिया है जिस कारण चहुँओर   त्राहि-त्राहि मची हुई है ।खेतों में फसलें पकी खड़ी हैं।जो अपनी मुक्ति के लिए पुकार रही हैं। कहाँ तो ये पुकार सुनाई दिया करती थी ---' कणकां दी मुक गई राखी••••ओ जट्टा आई बैसाखी ,ओ जट्टा आई बैसाखी ।' लेकिन आज स्थिति भयावह हो रही है।कोरोना के कहर से सभी डरे हुए हैं। ऐसे में बैसाखी पर्व का उल्लास भी कम होना स्वाभाविक   है । पंजाब का प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म व जाति का क्यों न हो,वर्ष भर इस दिन की प्रतीक्षा करता है और अपने नए कार्यों की शुरुआत इसी दिन से करता है ।

बैसाखी का दिन सूर्य पर्व का प्रथम दिन माना जाता है । यह पर्व  बैसाख माह संक्रांति  दिवस के रूप में मनाया जाता है । विशेष रूप से यह कृषि से जुड़ा पर्व है। भारत वर्ष  की संपूर्ण अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है । इसी माह में गेंहू की फसल की कटाई की जाती है। गेंहू को कणक भी कहते हैं और कणक का अर्थ सोना भी होता है ।किसान सोने के समान गेंहू को देखकर अति प्रसन्न होकर झूम उठता है और  कह उठता है 'औ जट्टा आई बैसाखी ।' बैसाखी पर्व के साथ सांस्कृतिक, धार्मिक व कुछ  ऐतिहासिक घटनाएँ भी जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ी व दर्दनाक घटना जलियांवाला बाग की जब भी याद आती है तो हर भारतवासी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ठीक एक सौ एक वर्ष पूर्व 13 अप्रैल 1919 का भी ऐसा ही दहशत भरा दिन था जब जलियांवाला  बाग अमृतसर में निहत्थे  एवं शांतिमय जनसमूह पर ब्रिगेडियर जनरल डायर  ने अंधाधुंध गोलियां बरसाकर सैंकड़ों  लोगों को मौत की नींद सुला दिया और हजारों को घायल कर दिया था ।

आज भी लोग 1919 की बैसाखी नहीं भूले। जब चारों ओर आवाज गूंज रही थी 'रौलेट एक्ट मर्दाबाद' , 'काला कानूूून वापस लो।' जलियांवााला बाग मेें हजारों नर -नारी एकत्र थे।शहर के मकानों से घिरे इस बाग में प्रवेश करने के  संकरे दरवाजे पर  खड़े अपने फौजी जवान लिए जनरल डायर ने भीड़ पर  गोलीबारी का हुक्म  दिया था। लोग भाग-दौड़ करते,चीखते-चिल्लाते हुए  घायल पंछी की तरह फड़फड़ा रहे थे । इस प्रकार बैसाखी, खूनी बैसाखी बन गई थी । निहत्थे लोगों पर सोलह सौ गोलियों की वर्षा कराने वाला जनरल डायर कुछ साल बाद अपने ही घर में पश्चाताप की आग में झुलस कर मर गया था ।

जनरल डायर ब्रिटिश शासन का मुक्तिदाता था।,लेकिन भारतीय राष्ट्रवादियों के लिए  वह शांति का दुश्मन तथा निर्दयी खलनायक था। जिसने क्रूरता और अमानवीयता का कार्य किया । क्या वह हृदयहीन था?जिसने बिना चेतावनी दिए जलियांवाला बाग में कत्लेआम किया। जब डायर ने जलियांवाला बाग में प्रवेश किया तो उसके साथ कोई नागरिक अधिकारी नही था। ऐसा कहा जाता है कि आश्चर्य तो इस बात पर था कि इससे पहले वह कभी बाग में गया ही नही था । डायर ने कैप्टन ब्रिगज़ की ओर देखकर उससे पूछा कि बाग में। एकत्रित लोगों की कितनी संख्या है? ब्रिगज़ ने अनुमान से 5000 संख्या बताई  लेकिन उस समय स्त्रियों -पुरुष और बच्चों समेत संख्या 20000 के लगभग थी । डायर ने उस समय लोगों को चेतावनी देना भी जरूरी नही समझा।उसी समय अपने सिपाहियों को 25 राईफल दाईं और तथा 25बाईं ओर तैनात कर दिया और गोली चलाने का आदेश दे दिया ।शुरु में सिपाहियों ने गोली हवा में चलाई तो डायर ने चिल्ला कर कहा, 'गोली नीचे लोगों पर चलाओ। तुम्हे किसलिए यहां लाया गया है ?' इस वीभत्स रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य को देखकर अर्थर स्विन्सन ने वर्णन किया है कि 15 मिनट तक गोली चलती रही डायर के सिपाहियों ने 1650  राउंड चलाकर सारे बाग को श्मशान बना दिया था ।

प्रत्येक राईफलमैन को 33 राउंड चलाने को दिए गए थे और वे गोली बारूद खत्म होने तक फायरिंग करते रहे ।बाद में डायर ने सोचा कि यदि और अधिक गोलियां होती तो वे भी लोगों पर चलाई जातीं। सीएफ एंड्रयूज ने इस हत्याकांड को 'नृशंस एवं अमानवीय घृणित ' कार्य बताया । लेकिन जनरल डायर के इंग्लैंड वापिस आने पर उसे 26000 स्टर्लिंग पौंड की राशि  दी गई जो 'मार्निंग पोस्ट '  अखबार ने एकत्रित की थी। तेरह महिलाओं की गठित समित  द्वारा   जनरल डायर को 'पंजाब का मुक्तिदाता ' घोषित करते हुए सम्मान स्वरूप तलवार एवं कुछ राशि भेेंट की गई ।इस घटना से  उत्तेजित होकर रविन्द्र नाथ टैगोर ने विरोध प्रकट करते हुए अपनी 'नाइटहुड' उपाधि त्याग दी।

यदि देखा जाए तो इसे जनरल डायर का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस भारत की मिट्टी में जो अब पाकिस्तान में है उसने जन्म लिया जिस हवा -पानी -अन्न को खाकर और जिस  परिवेश में उसकी परवरिश हुई ।जिस धरातल पर तमाम पदोन्नतियां मिली।जिस स्वर्ण मंदिर में माथा टेका ,उसी अमृतसर पवित्र नगरी में अपने निर्दयी, बर्बर अमानवीयता और पाषाण हृदय का प्रमाण भी दे दिया ।उसने करूणा, दया, सहानुभूति, मानवता और सहयोग की भावना को भुलाकर ये कार्य किया । जब उसे अपनी गलती का पश्चाताप हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।1921 में लकवाग्रस्त होने के बाद ठीक नही हुआ ।जीवन के अंतिम क्षणों में बड़बड़ाते हुए कहा, 'मैं स्वस्थ नही होना चाहता, मैं केवल मरना चाहता हूँ। मेरा ईश्वर जानता है कि मैंने क्या सही क्या गलत किया ।' लेकिन जलियांवाला बाग हत्याकांड में उसने ब्रिटिश -भारत इतिहास का अमानवीय कलम से जो रक्तरंजित अध्याय लिखा, वह अक्षम्य अपराध बनकर रह गया ।

गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा  खालसा पंथ की स्थापना भी इसी दिन अर्थात् बैसाखी पर्व पर ही की गई थी । हिमालय के पश्चिम छोर की छाया में नये बसे एक नगर के खुले मैदान में हजारों लोग जमा थे।उन सभी के ऊपर एक प्रश्न तलवार की तरह झूल रहा था,  'सिर चाहिए •••सिर चाहिए ।'आँखों से आग बिखेरते नंगी तथा चमचमाती तलवार घुमाते हुए गुरु गोविंद सिंह जी कह रहे थे -'मुझे सिर चाहिए, मुझे सिर चाहिए ।' इतने में एक आवाज आई, 'मैं अपना सिर देने को तैयार हूँ।मेरा नाम दयाराम है।मैं खत्री हूँ।लाहौर का रहने वाला हूँ ।आपको सिर चाहिए ,मेरा सिर हाजिर है।' भीड़ विस्फारित नेत्रों से उसे देख रही थी ।वह झूमता हुआ उस लपलपाती तलवार की ओर बढ़ गया तथा  वह और तलवार वाला आदमी खेमे की ओट में चले गए ,खटाक••• और खेमे से खून की धारा बह निकली। कुछ देर बाद मंच पर फिर वही तलवार चमचमा रही थी, परन्तु इस बार वही प्रश्न अधिक भयावह रूप लेकर झूल रहा था ।'एक सिर और चाहिए ••।'सन्नाटा छा गया ।फिर एक मद्धिम -सी आवाज आई ,'मैं धरम दास जाट हूं।मैं सिर देने को तैयार हूँ ।हस्तिनापुर का रहने वाला हूं।' कहकर वह भी लपलपाती तलवार की ओर बढ़ गया । खटाक•••• की आवाज और भी ज्यादा भयानक आवाज में गूंजी।खेमे से खून की धारा बह निकली । फिर वही प्रश्न •••, ' एक सिर और चाहिए •••।' 'मैं अपना सिर देने को तैयार हूं।' प्रश्न पर प्रश्न उभरा, -'क्या आप मेरा सिर स्वीकार करेंगे? क्योंकि मैं छोटी जाति का हूं •••छिम्बा नाम है मेरा ।' मंच पर जिस व्यक्ति की आँखों से लोग आग बरसती देख रहे थे, एकाएक वे तरल हो गई ।
तलवार के साथ ही उसकी दोनों भुजाएं भी पसर गईं  और उसी के साथ द्वारिका का रहने वाला मोहकम चंद समा गया। फिर चौथी मांग के साथ तलवार की धार पर खून की एक परत और चढ़गई।इस बार सिर देने के लिए प्रस्तुत हुआ जगन्नाथ पुरी का धीवर हिम्मत राय। 'मेरा सिर लीजिए, मैं जाति से नाई हूं •••शायद आपकी प्यास बुझ जाए।' देखते ही देखते वह दृश्य रहस्यमय खेमे के अंधकार में डूब गया । लोग सोच रहे थे गुरु गोविंद सिंह जी को क्या हो गया ? वह धन,वस्त्र, घोड़े -हाथी मांगने की बजाय सिर मांग रहे हैं ? पाँच लोगों ने अपने सिर दे दिए थे ।वे गुरु के प्यारे बन गए । सबके प्यारे बन गए --'पंज प्यारे' । परीक्षा में सफल होने के पश्चात ये प्यारे  सुसज्जित होकर जनसमूह के समक्ष हाथों में तलवार लेकर खड़े थे। चार सदियों से अधिक  गुजर जाने के बाद भी आज उन्हें याद किया जाता है।नाम याद आने की बजाय  'पंज प्यारे ' याद आते हैं।इन सिर देने वालों की याद बैसाखी का महत्त्व और भी बढ़ा देती है।