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पँख फैलाने दे उसे,अपनी चाह पाने दे उसे
August 22, 2020 • बिश्वेश्वर ढोडियाल • साहित्य


स्वच्छ,  निर्मल और  तारो भरे शून्य मे।
अपने भबिष्य की लम्बी चाह की उडान मे।
अपने आगे पीछे हर दिशा के उस वक्षस्थल मे।
जिधर उडे उडने दे उसे,पँख फैलाने दे उसे।

भबिष्य की इक लम्बी लकीर
पढने दे जीवन की तस्वीर।
आडी तिरछी रेखाओँ को चीर।
पढने दे मन की वह तस्वीर।
तब आभास सुखद का हो उसे
पँख फैलाने दे उसे।

दर्द,पीडा,दुख की अनुभूति
जब तक न करे इसकीवह पूर्ति।
ठोकरोँ की टीस,काटोँ की चुभन।
भूख प्यास से पीडित हो तन।
कुछ तो एहसास लगे तब उसे।
पँख फैलाने दे उसे।

कुछ पाने को कुछखोना जरूरी।
हँसने के लिये रोना है जरूरी।
अपने मँजिल की उस चाह मे।
खोज भबिष्य कीहर राह मे।
मँजिल को पाने दे उसे।
पँख फैलाने दे उसे।
अपनी चाह पाने दे उसे।