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स्वस्थ आलोचना को दंडित करने का अर्थ है, विरोध का मुंह बंद कर देना
August 20, 2020 • क़ुतुब मेल • राष्ट्रीय

इलाहाबाद // सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशान्त भूषण को अवमानना का दोषी घोषित किये जाने के खिलाफ इलाहाबाद का नागरिक समाज द्वारा बालसन चैराहे पर एक जनविरोध आयोजित हुआ। प्रदर्शन मे वक्ताओं ने इस बात पर प्रकाश डाला  कि श्री भूषण के दोनो ट्वीट आम वादकर्ताओं द्वारा न्याय की उम्मीद में सर्वोच्च न्यायालय में मामले दर्ज करने के दौरान आ रही कठिनाईयों को रेखांकित करती हैं।

पहली ट्वीट सर्वोच्च न्यायालय में चल रहे लाॅकडाउन प्रणाली की आलोचना करते हुए कहती है कि यह “नागरिकों की न्याय की खोज के मौलिक अधिकार” को बाधित करती है। दूसरी ट्वीट भारत में लोकतंत्र के विनाश का जिक्र करते हुए कहती है कि जब इतिहासकार इसका मूल्यांकन करेंगे तो तब वे “विशेष तौर पर इस विनाश में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका और इससे भी ज्यादा 4 मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका को चिन्हित करेंगे”।

ये सारा कुछ हमारी न्याय व्यवस्था के कामकाज का एक आलोचनात्मक मूल्यांकन है। यह चिन्हित की गयी कमियों में सुधार प्राप्त करने का प्रयास है। सच्चाई की खोज के लिए हमारा संवैधानिक ढांचा और सभ्य रवैया आलोचना और प्रतिआलोचना को स्वीकार करता है और संस्थाओं को सुधारने में इस स्वस्थ प्रणाली को अपनाता है। स्वस्थ आलोचना को दंडित करने का अर्थ है, विरोध का मुंह बंद कर देना और यह समाज के आगे बढ़ने व नागरिकों के कल्याण हित के विपरीत है।  नागरिक समाज का यह विरोध “आलोचना अवमानना नहीं है” के नारे तले हुआ ।

प्रदर्शन में भाग लेने वालों में हरिश्चन्द्र द्विवेदी, नसीम अंसारी, आनन्द मालवीय, उमर ख़ालिद, अनवर आज़म, महताब आलम,गायत्री गांगुली, ऋचा सिंह, पद्मा सिंह, सारा अहमद सिद्दीकी, नीशू, चंद्रावती, अधिवक्तागण आशुतोष तिवारी, माता प्रसाद पाल, राजवेन्द्र सिंह, कुंअर नौशाद, साहब लाल निषाद,अखिल विकल्प, विकास स्वरूप , महाप्रसाद एवं डा0 आशीष मित्तल, अमित, उमर, अनवर, सुनील मौर्य,रिहाई मंच से राजीव यादव, गौरव गुलमोहर, भीम लाल, शैलेश पासवान, असरार नियाजी, आदि मौजूद थे। प्रदर्शन का संचालन अविनाश मिश्र एवं आभार ज्ञापन नसीम अंसारी ने किया ।