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तिरस्कृत मां की व्यथा
June 15, 2020 • डॉ• मुक्ता • साहित्य

डॉ• मुक्ता

स्टेशन पर बैठी
सत्तर वर्षीय वृद्धा
खुद से हाल-बे-हाल
जिसके उद्वेलित अंतर्मन में 
उठ रहे थे अनगिनत सवाल
यह कैसा दुनिया का दस्तूर
यहां अपने, अपने बन
अपनों को छलते
यह कैसा लॉकडाउन
भावनाएं मृत्त
और नदारद संस्कृति के प्रति
आस्था- संस्कार
नहीं रिश्तों की अहमियत
और लुप्त संबंध-सरोकार

इसी बीच एक महिला पत्रकार
आ पहुंची उस वृद्धा के पास
देख उसे उधेड़बुन में
उसने प्रश्न दाग़ा उस पर
क्यों बैठी हो अशांत-क्लांत
खुद से बे-खबर
कहां जाना है तुम्हें
और कौन है तुम्हारे साथ
पहले तो वह आश्चर्य-चकित
निस्तब्ध, ठगी-सी
मौन हो ताकती रही
फिर बह निकला
ह्रदय में दफ़न
भावनाओं का सैलाब

उसे बीमार बेटे की तीमारदारी हित
रवाना कर दिया गया था धोखे से
और आ गयी वह दिल्ली से मुंबई
ठीक होते ही बदले
कलयुगी बेटे ने तेवर
भाई को कोसा
मां को जली-कटी सुनायी
शराब के नशे में उसे चार बार मारा 
ज़लील कर घर से बाहर निकाला
 'जा कहीं भी भीख मांग कर खा
मेरी चौखट पर मत आना लौट कर'

सो! वह चाहती है दिल्ली जाना 
उसका एक बेटा रहता है वहां
परंतु वह जानती है
नहीं देगा वह
अपने आशियां में उसे पनाह
न ही उसे रखेगा अपने साथ
वैसे भी रोज़-रोज़
मार खाने से बेहतर है
भीख मांग कर जीवन-निर्वाह करना
तनिक सोचो-विचारो
दो जून की रोटी के लिए
चाकरी करना
व्यंग्य-बाणों के प्रहार
और ज़िल्लत सहन करना
होता होगा कितना कठिन 

तभी उस महिला ने
एक अन्य प्रश्न दागा
क्या आपके और भी बच्चे हैं?
हां ! मेरी दो बेटियां और एक बेटा है
कुल मिला कर पांच बच्चे हैं मेरे
परंतु मैं जानती हूं
बेटियों की विवशता
वे चाहकर भी कुछ न करने में
पाती हैं स्वयं को असमर्थ
और बेटा– वह तो ग़ुलाम है
कठपुतली की भांति
पत्नी के इशारों पर नाचता
उसी की भाषा बोलता वह निर्लज्ज

सो! यह है एक अकाट्य सत्य
विधवा किसी की मां नहीं होती
सब उससे बात करने से कतराते
उसे बोझ समझ पीछा छुड़ाते
पति को याद कर
उसके नेत्रों से अश्रु-प्रवाहित होते
और वह कहती
'बहुत अच्छे थे और उनके न रहने पर
वह दर-दर की ठोकरें खाने को है विवश' 
पत्रकार महिला ने उसे आश्वस्त किया
हम सब हैं तुम्हारे साथ
धैर्य रखो तुम
मत व्यर्थ आंसू बहाओ
इनसे नहीं होगा
उनकी दूषित सोच में परिवर्तन

प्रश्न उठता है
क्या इसी दिन के लिए
मांगता है औलाद इंसान
देता है बलि अपने सपनों की
रौंद डालता है अपने अरमानों को
देता है उनकी हर इच्छा को तरज़ीह
परंतु विवाह के पश्चात् संतान रंग बदलती
आईना दिखाती और आभास कराती
'यह है तुम्हारे कृत-कर्मों का फल
जाओ!अपने हिस्से के
दु:ख-दर्द को सहन करो
भीख मांगो या लो वृद्धाश्रम की शरण
हमें स्वतंत्रता से अपनी ज़िंदगी जीने दो'

काश ! वे विवश माता-पिता में
देख पाते अपना भविष्य
तो घटित न होते इस बेदर्द दुनिया में
ऐसे घिनौने हृदय-विदारक हादसे