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वक्त की इस नाव पर सवार हम
March 27, 2020 • सुषमा भंडारी • साहित्य

सुषमा भंडारी

मुक्तक
वक्त की इस नाव पर सवार हम 
मान कैसे लेंगें अपनी हार हम ।
यूं ही आयेंगी मुसीबतें सनम
फिर भी कर ही लेंगे भव पार हम ।

कर्म की हो नाव और मंजिलें
अपनी ही बन जायेंगे पतवार हम ।
है तेरा ही आसरा प्रभु जान लो
केवट गर प्रभु तो क्यूं मंझधार हम ।

मुश्किलों की आंधियाँ भी आयेंगी
है नहीं फितरत कि माने हार हम ।
वादियाँ खुशियों भरी हैं जान लो 
कर रहे है कब से इंतजार हम ।

मिलन के वास्ते लहरें किनारे पर भटकती हैं 
मगर ये प्रीत की बातें समन्दर को खटकती हैं 
लहर के वेग से सुन लो लहर की वेदना के स्वर
छनक कर कांच सी बूंदे हाय जब यूँ चटखती हैं 

तमन्नओं की आँधी है मैं नन्हा सा हूं इक पत्ता
मैं नन्ही सी मधुमक्खी दुनिया शहद का छत्ता
निकलना चाह्ती हूं मैं धंसे हैं पांव गहरे तक
जो बाजी खेलना जाने है उसके हाथ में सत्ता